“स्वयं सहायता समूह: करनाल की दीपा जैसी महिलाएं कैसे बन रहीं हैं आत्मनिर्भरता की मिसाल”

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करनाल, हरियाणा।
जब बात महिलाओं की आत्मनिर्भरता की आती है तो ‘स्वयं सहायता समूह’ (Self Help Group) एक सशक्त मंच बनकर उभरा है, जहां महिलाएं अपने हुनर और परिश्रम के बल पर ना केवल अपनी पहचान बना रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत भी बन रही हैं। करनाल जिले की दीपा इसकी जीवंत मिसाल हैं, जिन्होंने वर्ष 2017 में एक छोटे से प्रयास से अपने सपनों की उड़ान भरी और आज चार जिलों की महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं।

दीपा की कहानी: जहां संघर्ष बना सफलता की सीढ़ी

दीपा का जीवन पहले भी आम महिलाओं की तरह था — घर की जिम्मेदारियों में उलझा हुआ, आर्थिक निर्भरता पति पर और सामाजिक संकोचों से घिरा हुआ। लेकिन वर्ष 2017 में उन्होंने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपने जीवन को एक नई दिशा दी। उन्होंने सबसे पहले बैग बनाने का प्रशिक्षण लिया और फिर अपने इस हुनर को अपनी कमाई का जरिया बनाया। शुरुआत में उन्होंने 50 हजार रुपये का पहला लोन लेकर अपने घर में बैग बनाने का काम शुरू किया।

एक से अनेक तक की यात्रा

दीपा ने इस काम को अकेले ही नहीं किया। उन्होंने अपने अनुभव और आत्मबल से अपने साथ 10 अन्य महिलाओं को भी जोड़ा और उन्हें प्रशिक्षण देना शुरू किया। यह महिलाओं का एक ऐसा समूह बना जिसने मेहनत और लगन से अपने व्यापार को आगे बढ़ाया। दीपा स्वयं इस समूह की सचिव हैं और गांव की ग्राम संस्था से भी जुड़कर स्थानीय विकास कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

महिला सशक्तिकरण की असली परिभाषा

समूह से जुड़ने के बाद दीपा ने बैंक से दो लाख रुपये का लोन लेकर एक दुकान खरीदी। वहीं से उन्होंने अपने समूह की महिलाओं के साथ बैग निर्माण का काम शुरू किया। ये महिलाएं अब न केवल बैग बना रही हैं, बल्कि उन्हें खुद मार्केटिंग करके बेच भी रही हैं। इससे ना केवल इनका आत्मबल बढ़ा है, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी मिली है। आज उनके बनाए गए बैग्स की मांग कई कंपनियों और एनजीओ में है।

चार जिलों में फैला बदलाव का उजाला

दीपा आज सिर्फ अपने गांव या जिले तक सीमित नहीं हैं। वह करनाल सहित चार जिलों में महिलाओं को बैग निर्माण का प्रशिक्षण दे रही हैं। जूट और लेदर जैसे पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ उत्पादों से वह बैग बनाना सिखाती हैं। उन्होंने एमडीडी बाल आश्रम की किशोरियों को भी प्रशिक्षित किया, ताकि वे भविष्य में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।

ट्रेनिंग में क्या-क्या सिखाया जाता है?

दीपा के प्रशिक्षण सत्रों में महिलाएं निम्नलिखित बैग बनाना सीखती हैं:

  • जूट शॉपिंग बैग
  • ट्रैवल बैग
  • स्पोर्ट्स बैग
  • जिम बैग
  • पिट्ठू बैग
  • हैंड किट
  • लेडीज पर्स

यह बैग्स हाथ से बनाए जाते हैं और इनकी गुणवत्ता किसी बड़े ब्रांड से कम नहीं होती। यही वजह है कि अब इन्हें ऑनलाइन भी बेचा जा रहा है और समूह को देशभर से ऑर्डर मिलने लगे हैं।

सामाजिक रूढ़ियों से लड़ाई

दीपा बताती हैं कि जब उन्होंने गांव की महिलाओं को अपने साथ जोड़ना शुरू किया, तो यह सबसे कठिन काम था। कई महिलाएं सामाजिक दबाव, पति की असहमति, या आत्मविश्वास की कमी के कारण आगे नहीं आना चाहती थीं। लेकिन दीपा ने प्रत्येक महिला से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की, उनके मन के डर को समझा और उन्हें आश्वस्त किया कि यह काम उनके लिए एक नया रास्ता खोल सकता है।

बदलती सोच, बदलता समाज

दीपा का कहना है कि आज वह अपने पति के साथ मिलकर परिवार का खर्च चला रही हैं। पहले जहां हर छोटे-मोटे खर्च के लिए उन्हें पति पर निर्भर रहना पड़ता था, वहीं अब वे अपनी आय से बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च और यहां तक कि अपनी पसंद की चीजें भी खरीद पा रही हैं। इस बदलाव ने उनके आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा दिया है।

आर्थिक मजबूती से सामाजिक पहचान तक

आज दीपा और उनके समूह की महिलाएं खुद की दुकान चला रही हैं, ऑर्डर ले रही हैं, उत्पाद बना रही हैं, बेच रही हैं और बचत भी कर रही हैं। उन्होंने यह साबित किया है कि यदि सही मार्गदर्शन और मंच मिले, तो महिलाएं किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं। स्वयं सहायता समूह ने उन्हें सिर्फ आर्थिक मजबूती ही नहीं दी, बल्कि समाज में एक नई पहचान भी दिलाई।

संपादकीय टिप्पणी

आज जब देश आत्मनिर्भर भारत की बात करता है, तब दीपा जैसी महिलाओं की कहानी उसकी नींव को मजबूत करती है। यह एक सामाजिक क्रांति है जो नीचे से ऊपर की ओर उठ रही है, जहां गांव की महिलाएं अपने हुनर और मेहनत से ना केवल खुद को, बल्कि पूरे समाज को बदल रही हैं। सरकार और स्वयंसेवी संगठनों को ऐसे प्रयासों को बढ़ावा देना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ना चाहिए।

निष्कर्ष

दीपा की यह प्रेरक कहानी न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि जब इरादे मजबूत हों, तो संसाधनों की कमी भी रुकावट नहीं बनती। स्वयं सहायता समूह एक ऐसा मंच है जो हजारों महिलाओं के सपनों को उड़ान देने का काम कर रहा है।

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