करनाल में स्कूलों की तस्वीर बदलने की तैयारी: नाम से बुलाओ, जुड़ाव बढ़ाओ – विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने का नया मिशन

करनाल में स्कूलों की तस्वीर बदलने की तैयारी: नाम से बुलाओ, जुड़ाव बढ़ाओ – विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने का नया मिशन
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करनाल में शिक्षा की एक नई पहल: विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने पर शिक्षकों का फोकस

इंद्री, करनाल।
“बच्चे स्कूल से क्यों दूर हो रहे हैं?”
“क्या आज का स्कूल उनके लिए आकर्षक नहीं रहा?”
“क्या अध्यापक बच्चों को उनके नाम से पुकारते हैं?”

ये तीन सवाल इस समय करनाल जिले के प्राथमिक शिक्षकों के बीच मंथन का विषय बने हुए हैं। और इसका कारण बना है जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान शाहपुर (DIET) द्वारा इंद्री में आयोजित पाँच दिवसीय खंड स्तरीय अध्यापक प्रशिक्षण कार्यशाला, जिसका चौथा दिन छात्रों की उपस्थिति बढ़ाने और शिक्षण पद्धतियों में बदलाव पर केंद्रित रहा।

नाम से बुलाओ, आत्मीयता से जोड़ो

कार्यशाला को संबोधित करते हुए DIET शाहपुर के प्राध्यापक डॉ. करनैल सिंह ने कहा, “शिक्षक यदि छात्रों को उनके नाम से संबोधित करें तो छात्र एक अलग ही आत्मीयता महसूस करते हैं। इससे शिक्षक और छात्र के बीच संवाद मजबूत होता है और छात्र स्कूल में सहज महसूस करते हैं।”

उन्होंने एक उदाहरण साझा करते हुए कहा, “एक बार एक बच्चा तीन दिन तक स्कूल नहीं आया। जब मैंने उसकी अनुपस्थिति पर बात की और पूछा – ‘रवि, क्यों नहीं आए तीन दिन?’ – तो उसका चेहरा खिल उठा। वह बोला, ‘सर, आपको मेरा नाम याद है!’ बस, उसके बाद वह रोज स्कूल आने लगा।”

सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की समझ है ज़रूरी

डॉ. करनैल सिंह ने यह भी कहा कि एक शिक्षक को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे यह भी जानना चाहिए कि उसका छात्र किस परिवार से है, किस सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से है। “जब हम यह जान लेते हैं कि एक बच्चा किस माहौल से आता है, तब हम उसकी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और मार्गदर्शन दे सकते हैं,” उन्होंने कहा।

यह दृष्टिकोण अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के साथ गहराई से जुड़ गया है, जो शिक्षा को समावेशी, संवेदनशील और अनुभवात्मक बनाने पर बल देती है।

विद्यालयों में बढ़े छात्रों की संख्या – क्यों है यह अब आवश्यक?

हरियाणा जैसे राज्य में सरकारी स्कूलों की छवि को सुधारने के लिए यह ज़रूरी हो गया है कि अधिक से अधिक बच्चे स्कूल में दाखिला लें। सरकार द्वारा चलाई जा रही ‘स्कूल चले हम’ जैसी मुहिमों का सफल क्रियान्वयन तभी संभव है जब जमीनी स्तर पर शिक्षक सक्रिय भूमिका निभाएं।

प्राध्यापक डॉ. देवेंद्र शर्मा ने कहा, “शिक्षा के क्षेत्र में सुधार तभी संभव है जब हम बच्चों को डर नहीं, स्नेह, प्रोत्साहन और समावेश का माहौल दें। हर बच्चा खास होता है – चाहे वह किसी भी वर्ग, जाति या क्षेत्र से आता हो।”

FLN के तहत नई शिक्षा नीति की बुनियाद पर प्रशिक्षण

इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य नई शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत FLN (Foundational Literacy and Numeracy) यानी आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर आधारित शिक्षण को रुचिकर व गतिविधि-आधारित बनाना था। प्रशिक्षण संयोजक धर्मेंद्र चौधरी ने बताया कि “इस पाँच दिवसीय कार्यशाला में अध्यापकों को सीखने-सिखाने की गतिविधियों में प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक सुधार आ सके।”

डॉ. बारू राम व रविंद्र शिल्पी, दोनों प्रशिक्षकों ने बताया कि इस प्रशिक्षण का फोकस केवल शैक्षणिक ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के सीखने की गति, रुचि और व्यक्तिगत ज़रूरतों को समझने पर भी है।

अध्यापकों को जो सिखाया जा रहा है:

  1. नाम से संबोधित करना और आत्मीय संबंध बनाना
  2. बच्चों की पारिवारिक परिस्थितियों को समझना
  3. शिक्षण को गतिविधि-आधारित बनाना
  4. सीखने के लिए प्रेरणादायक वातावरण बनाना
  5. समावेशी शिक्षा के सिद्धांतों को अपनाना
  6. NEP 2020 और FLN के लक्ष्यों को कार्यान्वित करना

शिक्षा विभाग की नई रणनीति: ‘हर बच्चा स्कूल में, हर बच्चा सीख रहा है’

जैसा कि बीआरपी (Block Resource Person) धर्मेंद्र चौधरी ने बताया, करनाल में यह एक नई रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। उनका कहना है, “सरकार अब सिर्फ बुनियादी ढांचे पर ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की मानसिकता और दृष्टिकोण में बदलाव पर भी ध्यान दे रही है। इसीलिए इस तरह की कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं।”

महिलाओं की भागीदारी और प्राथमिक शिक्षा में भूमिका

कार्यशाला में महिला शिक्षकों की भी अहम भूमिका रही। एबीआरसी प्रियंका और सविता ने कहा कि “एक महिला शिक्षक बच्चों को मातृत्व के भाव से देखती है, जिससे वह उन्हें बेहतर मार्गदर्शन दे सकती है।”

समापन दिवस पर विद्यार्थियों के लिए विशेष गतिविधियाँ

प्रशिक्षण के अंतिम दिन शिक्षकों को यह सुझाव दिया गया कि वे स्कूलों में बच्चों के लिए कहानी सुनाना, रंगों के माध्यम से गणित सिखाना, पपेट शो और अन्य रचनात्मक गतिविधियाँ नियमित रूप से करें। इससे बच्चे स्कूल से जुड़ाव महसूस करते हैं और शिक्षा में उनकी रुचि बनी रहती है।

क्लासरूम से क्लस्टर तक – बदलाव की बयार

डॉ. करनैल सिंह का कहना है कि “बदलाव क्लासरूम से शुरू होता है, लेकिन जब सभी शिक्षक मिलकर काम करते हैं तो यह बदलाव पूरे ब्लॉक, जिले और राज्य तक जाता है। कर्नाल का यह मॉडल अन्य जिलों के लिए प्रेरणा बन सकता है।”

जनभागीदारी से बनेगा मजबूत स्कूल सिस्टम

कार्यशाला के अंतिम सत्र में यह भी चर्चा की गई कि स्कूलों में ग्राम पंचायत, एसएमसी (स्कूल मैनेजमेंट कमेटी), अभिभावक और स्थानीय संगठनों की भूमिका भी अहम होनी चाहिए। जब पूरा समाज स्कूल के साथ जुड़ता है, तभी शिक्षा एक आंदोलन बनती है।

जिला शिक्षा अधिकारी का संदेश

हालांकि वह कार्यशाला में मौजूद नहीं थे, लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी का संदेश साझा किया गया: “आज शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक बदलाव का माध्यम है। हर शिक्षक इस बदलाव का वाहक है।”

निष्कर्ष: शिक्षा का नया युग – जहाँ शिक्षक भी सीखते हैं

यह कार्यशाला एक संदेश छोड़ गई – “शिक्षक भी एक जीवन भर का विद्यार्थी होता है।” जब शिक्षक खुद सीखते हैं, तभी वे अपने छात्रों को बेहतर शिक्षा दे पाते हैं। और जब हर शिक्षक यह संकल्प ले कि वह हर बच्चे तक पहुंचेगा, तो कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा।

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