कान्हा की सेवा: कविता शर्मा का 15 वर्षों का अटूट नाता और बच्चों को संस्कार देने का प्रयास

कान्हा की सेवा: कविता शर्मा का 15 वर्षों का अटूट नाता और बच्चों को संस्कार देने का प्रयास
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“कान्हा की सेवा” केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि हरियाबांस गांव की कविता शर्मा के लिए एक भावनात्मक, आध्यात्मिक और पारिवारिक जुड़ाव बन चुका है। बीते 15 वर्षों से वह लड्डू गोपाल यानी श्रीकृष्ण की नित्य सेवा कर रही हैं और यही सेवा उनके जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुकी है।

विशेष रिपोर्ट: मेरा कान्हा से है 15 साल का अटूट नाता

करनाल। जिस तरह एक माँ अपने शिशु की सेवा करती है, वैसे ही हरियाबांस गांव की कविता शर्मा पिछले 15 वर्षों से अपने कान्हा (लड्डू गोपाल) की सेवा करती आ रही हैं। उनके लिए यह सेवा केवल एक धार्मिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक जीवंत संबंध, एक आत्मीय रिश्ता और भावनाओं से ओतप्रोत भक्ति यात्रा है।

कविता जी बताती हैं कि कान्हा की सेवा अब उनके जीवन की आत्मा बन चुकी है। उनका दिन कान्हा को स्नान कराने, वस्त्र पहनाने और भोग लगाने से आरंभ होता है और रात उनके शयन तक की पूजा अर्चना में समर्पित रहता है। उनका विश्वास है कि इस सेवा से उन्हें आध्यात्मिक बल और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

सुबह का पहला कार्य – भोग लगाना

कविता जी का नियम है कि जब तक कान्हा को भोग नहीं लग जाता, तब तक घर में कोई भी सदस्य भोजन ग्रहण नहीं करता। “कान्हा हमारे घर के सबसे छोटे सदस्य हैं, उनकी सेवा पहले होनी चाहिए,” वे कहती हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक भाव से जुड़ी है, बल्कि पूरे परिवार को अनुशासन और सेवा की भावना भी सिखाती है।

सेवा में आती है भावनात्मक गहराई

वे कहती हैं, “जब मुझे बाहर जाना होता है, तो घर के अन्य सदस्यों को कान्हा की सेवा की ज़िम्मेदारी सौंपती हूँ। लेकिन स्वयं सेवा न कर पाने का मलाल मन में रह ही जाता है। बाहर से लौटने पर सबसे पहले कान्हा से बात करती हूँ, उन्हें गोद में उठाकर दुलार करती हूँ।”

कई बार सेवा करते हुए उनके आँखों से आँसू बह निकलते हैं। यह आँसू प्रेम और श्रद्धा के होते हैं — जो केवल भक्त और भगवान के बीच पनपते हैं।

कान्हा के साथ संवाद – जैसे पुत्र या भाई

कविता जी मानती हैं कि उनका कान्हा सिर्फ एक मूर्ति नहीं, बल्कि उनके जीवन का एक सजीव साथी है। वह बताती हैं, “कभी-कभी मैं कान्हा से अपने मन की बात कहती हूँ, जैसे कोई अपने भाई या बेटे से कहे। दुख-सुख, परेशानी, मन की उलझन – सब कान्हा से साझा कर लेती हूँ।”

यह रिश्ता उन्हें संबल देता है, और उनकी आत्मा को सुकून। उनका विश्वास है कि हर बार कान्हा उन्हें किसी न किसी रूप में उत्तर भी देते हैं – कभी सपने में, तो कभी आसपास की घटनाओं के माध्यम से।

सेवा से जुड़ी वृंदावन की यादें

कविता जी को जब भी मौका मिलता है, वे वृंदावन जाती हैं। वहाँ के मंदिर, कथाएँ, प्रवचन और रासलीला उन्हें भीतर तक छू जाती हैं।

“जब मैं वृंदावन जाती हूँ तो ऐसा लगता है जैसे कान्हा से और भी नज़दीक हो जाती हूँ। वहाँ की हवा भी भक्ति से महकती है।”

उनके लिए वृंदावन केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति की भूमि है।

बच्चों को भी सिखा रहीं सेवा और संस्कार

कविता शर्मा इस सेवा को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना चाहती हैं। वे अपने बच्चों को भी कान्हा की सेवा करना सिखा रही हैं।

“मैं चाहती हूँ कि मेरे बच्चे भी भावनात्मक रूप से भगवान से जुड़ें। सेवा से अनुशासन, श्रद्धा और कृतज्ञता जैसे गुण विकसित होते हैं।”

वह कहती हैं कि आज के समय में जब बच्चे मोबाइल और टीवी में उलझे रहते हैं, तब भक्ति और सेवा उन्हें संतुलित, संवेदनशील और संस्कारवान बनाने में मदद करती है।

कविता जी की दिनचर्या में कान्हा का स्थान

  • सुबह 5 बजे उठकर स्नान करने के बाद कान्हा का स्नान और वस्त्र परिधान
  • ताजा प्रसाद बनाकर भोग लगाना
  • माला जपना और कान्हा से बातचीत
  • दोपहर में विश्राम सेवा (छाया और पंखे की व्यवस्था)
  • शाम को फूलों से श्रृंगार
  • रात में दूध का भोग और शयन सेवा

इस नियमित जीवनशैली ने उन्हें अनुशासन, नियमितता और आत्म-नियंत्रण जैसे मूल्य भी सिखाए हैं।

भावनात्मक अनुभव और चमत्कारों का अहसास

कविता जी ने बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब मन बहुत परेशान था और उन्होंने बस कान्हा से बात की। कुछ ही समय में उन्हें समाधान मिल गया। उनका विश्वास है कि कान्हा सुनते हैं, समझते हैं और मार्गदर्शन भी करते हैं।

“एक बार बेटा बीमार था और दवा असर नहीं कर रही थी। मैंने कान्हा से प्रार्थना की और खुद से तुलसी-जल चढ़ाकर दिया। कुछ ही समय में सुधार दिखा।”

सेवा का विस्तार – आसपास की महिलाओं को भी जोड़ रहीं

अब कविता शर्मा केवल स्वयं सेवा नहीं करतीं, बल्कि गाँव की अन्य महिलाओं को भी जोड़ रही हैं। वे उन्हें बताती हैं कि यह सेवा कैसे की जाती है, किन बातों का ध्यान रखा जाता है और यह सेवा किस प्रकार मानसिक शक्ति देती है।

वह सप्ताह में एक बार सखी सेवा समूह के नाम से भजन-कीर्तन का आयोजन करती हैं।

कान्हा की सेवा का मानसिक और आध्यात्मिक प्रभाव

  • मानसिक सुकून: नियमित सेवा से तनाव कम होता है।
  • ध्यान और एकाग्रता: कान्हा की सेवा में मन लगाना ध्यान जैसा ही है।
  • संवेदनशीलता: दूसरों के प्रति दया और सहानुभूति बढ़ती है।
  • परिवार में सकारात्मक ऊर्जा: घर का माहौल शांत और प्रेमपूर्ण रहता है।

निष्कर्ष: एक भक्ति से भरी जीवन यात्रा

कविता शर्मा की यह कहानी केवल धार्मिक आस्था की नहीं है, यह भावनात्मक गहराई, आत्मिक जुड़ाव और अगली पीढ़ी को संस्कार देने की प्रेरणादायक गाथा है। कान्हा की सेवा उनके लिए केवल पूजा नहीं, बल्कि एक आत्मीय रिश्ता है जो हर दिन उन्हें जीवंत बनाए रखता है।

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