देश की सेवा करने वाले पूर्व सैनिक की पत्नी को क्या सरकारी अस्पताल में इलाज के बजाय “सिर्फ सेवा” की सलाह दी गई? करनाल से उठे इस सवाल ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर बहस छेड़ दी है।
कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज करनाल लापरवाही? पूर्व सूबेदार का आरोप – “तीन घंटे एंबुलेंस में रही पत्नी, इलाज नहीं मिला”
करनाल। कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज करनाल लापरवाही का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सांभली गांव निवासी सेना से सेवानिवृत्त सूबेदार संजय शर्मा ने आरोप लगाया है कि उनकी पत्नी को गंभीर हालत में अस्पताल लाने के बावजूद तीन घंटे तक न तो जांच की गई और न ही वार्ड में भर्ती किया गया। अंततः उन्हें यह कहकर वापस भेज दिया गया कि अब “इनकी सेवा कीजिए।”
मामला बुधवार देर रात से शुरू होता है, जब सूबेदार संजय शर्मा की पत्नी की अचानक तबीयत बिगड़ गई। सांस लेने में तकलीफ, अत्यधिक कमजोरी और बेचैनी की शिकायत के बाद परिवार में अफरातफरी मच गई। तत्काल उन्हें गांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया, जहां प्राथमिक उपचार दिया गया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। डॉक्टरों ने बड़े संस्थान में रेफर करने की सलाह दी।
परिवार सुबह-सुबह करनाल स्थित कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंचा। यहीं से विवाद और पीड़ा की कहानी शुरू होती है।
“तीन घंटे एंबुलेंस में रही पत्नी”
सूबेदार संजय शर्मा का आरोप है कि कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज पहुंचने के बाद उनकी पत्नी एंबुलेंस में ही रही। “हमने बार-बार डॉक्टरों और स्टाफ से अनुरोध किया कि हालत गंभीर है, कृपया जांच कर लें। लेकिन कोई देखने तक नहीं आया। तीन घंटे तक हम इंतजार करते रहे,” उन्होंने भावुक होते हुए कहा।
उनका दावा है कि न तो तत्काल जांच की गई, न ही इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट किया गया। आखिरकार उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि अब ज्यादा कुछ संभव नहीं है, “इनकी सेवा कीजिए।”
पीजीआई रोहतक में जारी है उपचार
इलाज से इनकार के बाद परिवार ने हार नहीं मानी। सूबेदार संजय शर्मा अपनी पत्नी को तुरंत पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआई रोहतक) लेकर रवाना हुए, जहां उनका उपचार जारी है।
परिवार का कहना है कि यदि समय पर उपचार मिल जाता तो स्थिति और बिगड़ती नहीं होती। हालांकि मेडिकल कॉलेज प्रशासन की ओर से इस आरोप पर तत्काल प्रतिक्रिया में कहा गया है कि मामला उनके संज्ञान में नहीं था।
प्रशासन का पक्ष
मेडिकल कॉलेज के एमएस गुलशन गर्ग ने कहा, “मामला संज्ञान में नहीं था। यदि ऐसा कुछ हुआ है तो यह गलत है। मामले की जांच कराई जाएगी। जांच के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।”
यह बयान फिलहाल जांच का आश्वासन देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था में इतनी देरी स्वीकार्य है?
क्या कहता है कानून?
भारत में आपातकालीन चिकित्सा सेवा को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि किसी भी अस्पताल को आपात स्थिति में प्राथमिक उपचार देने से इनकार नहीं करना चाहिए। सरकारी अस्पतालों की जिम्मेदारी और अधिक होती है क्योंकि वे सार्वजनिक धन से संचालित होते हैं।
स्वास्थ्य अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन के अधिकार” का हिस्सा माना गया है। ऐसे में तीन घंटे तक इंतजार और उपचार से इनकार जैसे आरोप गंभीर बन जाते हैं।
पूर्व सैनिक की पीड़ा: “देश की सेवा की, बदले में संवेदनशीलता की उम्मीद थी”
सूबेदार संजय शर्मा ने कहा, “मैंने वर्षों तक देश की सेवा की है। सीमाओं पर ड्यूटी की है। आज जब अपनी पत्नी के लिए अस्पताल आया तो लगा कि हमें इंसान की तरह भी नहीं देखा गया।”
उनकी आंखों में आंसू थे। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में संवेदनशीलता और जवाबदेही पर सवाल है।
ग्रामीण मरीजों की मुश्किलें
करनाल और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए बड़े सरकारी अस्पताल ही अंतिम उम्मीद होते हैं। निजी अस्पतालों का खर्च आम परिवार के लिए भारी पड़ता है। ऐसे में यदि सरकारी अस्पतालों में भी समय पर इलाज न मिले तो विकल्प सीमित हो जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को अक्सर रेफरल, लंबी कतार और स्टाफ की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इमरजेंसी प्रोटोकॉल को और सख्ती से लागू करने की जरूरत है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल
यह मामला कई स्तर पर जांच की मांग करता है:
- क्या इमरजेंसी ड्यूटी पर पर्याप्त स्टाफ मौजूद था?
- क्या मरीज की ट्रायेज (प्राथमिक जांच) हुई?
- क्या मेडिकल रिकॉर्ड में एंट्री की गई?
- क्या एंबुलेंस में इंतजार की पुष्टि सीसीटीवी फुटेज से हो सकती है?
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि आपातकालीन चिकित्सा मानकों का उल्लंघन माना जा सकता है।
संपादकीय विश्लेषण
स्वास्थ्य व्यवस्था में लापरवाही के आरोप नई बात नहीं हैं, लेकिन हर मामला एक परिवार की पीड़ा से जुड़ा होता है। पत्रकारिता का दायित्व केवल आरोप प्रकाशित करना नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, दोनों पक्षों को सामने लाना और व्यवस्था में सुधार की दिशा में संवाद स्थापित करना है।
इस मामले में तीन पहलू अहम हैं:
- मानवीय संवेदनशीलता – क्या अस्पताल स्टाफ ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाया?
- प्रोटोकॉल अनुपालन – क्या इमरजेंसी SOP का पालन हुआ?
- जवाबदेही – जांच के बाद क्या पारदर्शी कार्रवाई होगी?
यदि जांच में लापरवाही सिद्ध होती है तो यह केवल एक अधिकारी या डॉक्टर की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता मानी जाएगी।
निष्कर्ष
कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज करनाल की लापरवाही का यह आरोप अब जांच के दायरे में है। सच क्या है, यह प्रशासनिक जांच से स्पष्ट होगा। लेकिन यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं में देरी कभी-कभी जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी बन जाती है।
करनाल से उठी यह आवाज केवल एक परिवार की शिकायत नहीं, बल्कि सिस्टम से संवेदनशीलता और जवाबदेही की मांग है।
