पुरानी बीमारी कहकर बीमा क्लेम रोका, उपभोक्ता आयोग की फटकार: HDFC ERGO को ब्याज समेत 3.32 लाख देने के आदेश

पुरानी बीमारी कहकर बीमा क्लेम रोका, उपभोक्ता आयोग की फटकार: HDFC ERGO को ब्याज समेत 3.32 लाख देने के आदेश
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अगर बीमा कंपनी यह कहकर आपका क्लेम रोक दे कि बीमारी पुरानी थी, तो क्या आप हार मान लेंगे?
करनाल की एक महिला ने हार नहीं मानी—और नतीजा यह रहा कि उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी HDFC ERGO को न सिर्फ फटकार लगाई, बल्कि ब्याज समेत पूरा भुगतान करने का आदेश दे दिया।

पुरानी बीमारी कहकर बीमा क्लेम रोका—यह वाक्य अक्सर सुनने को मिलता है, लेकिन करनाल के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के ताज़ा फैसले ने साफ संदेश दिया है कि बिना ठोस सबूत बीमा क्लेम खारिज करना सेवा में कमी है।

करनाल। पुरानी बीमारी कहकर बीमा क्लेम रोका गया—इसी आधार पर HDFC ERGO General Insurance ने एक महिला का कैंसर उपचार क्लेम खारिज कर दिया था। अब जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, करनाल ने कंपनी को ब्याज सहित कुल 3.32 लाख रुपये का भुगतान करने के आदेश दिए हैं। यह फैसला न सिर्फ पीड़ित उपभोक्ता के लिए राहत है, बल्कि लाखों बीमाधारकों के लिए नजीर भी।

मामला क्या है?

सेक्टर-7, करनाल निवासी संध्या गोयल ने एचडीएफसी एर्गो से ‘माई हेल्थ सुरक्षा’ पॉलिसी ली थी। पॉलिसी की बीमित राशि 5 लाख रुपये थी। फरवरी 2022 में उन्हें गले में गंभीर दिक्कत हुई, जिसके बाद उन्हें दिल्ली के Sir Ganga Ram Hospital में भर्ती कराया गया। जांच में कार्सिनोमा थायराइड (कैंसर) की पुष्टि हुई।

इलाज पर 2,96,878 रुपये खर्च हुए। संध्या गोयल ने नियमानुसार बीमा क्लेम दाखिल किया—लेकिन कंपनी ने यह कहकर क्लेम खारिज कर दिया कि बीमारी पॉलिसी लेने से पहले से थी।

कंपनी का तर्क और आयोग की सख्ती

बीमा कंपनी ने आयोग के समक्ष दावा किया कि मरीज को 15–20 वर्षों से थायराइड की समस्या थी और यह तथ्य पॉलिसी लेते समय छिपाया गया
हालांकि, आयोग ने पाया कि कंपनी ऐसा कोई मेडिकल रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि कैंसर पॉलिसी लेने से पहले मौजूद था।

आयोग ने दो टूक कहा—

  • पुरानी थायराइड समस्या ≠ कैंसर की पूर्व जानकारी
  • पॉलिसी जारी करने से पहले मेडिकल जांच कराना बीमा कंपनी की जिम्मेदारी है
  • बिना ठोस साक्ष्य क्लेम रोकना अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में कमी है

फैसला क्या आया?

आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्यों ने कंपनी के रवैये को सेवा में कमी मानते हुए आदेश दिए—

  • इलाज खर्च: ₹2,96,878 पर 9% ब्याज
  • मानसिक उत्पीड़न: ₹25,000
  • कानूनी खर्च: ₹11,000
  • कुल भुगतान: ₹3.32 लाख
  • समयसीमा: 45 दिन

क्यों अहम है यह फैसला?

यह फैसला उन उपभोक्ताओं के लिए कानूनी ढाल है जिनके क्लेम अक्सर “पुरानी बीमारी” के नाम पर रोके जाते हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि अनुमान के आधार पर क्लेम खारिज नहीं किए जा सकते। बीमा कंपनियों को सबूत देने होंगे।

उपभोक्ताओं के लिए सीख

  1. पॉलिसी लेते समय घोषणा (Disclosure) ईमानदारी से करें
  2. क्लेम खारिज हो तो कारण लिखित में मांगें
  3. मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रखें
  4. उपभोक्ता आयोग में शिकायत से डरें नहीं

विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह निर्णय बीमा सेक्टर में जवाबदेही बढ़ाएगा। बीमा कंपनियां अब बिना मेडिकल जांच के पॉलिसी जारी कर बाद में क्लेम रोकने की रणनीति नहीं अपना पाएंगी।

व्यापक असर

इस आदेश के बाद बीमा कंपनियों को पॉलिसी अंडरराइटिंग के समय प्रक्रियात्मक पारदर्शिता बढ़ानी होगी। उपभोक्ताओं का भरोसा मजबूत होगा और अनुचित अस्वीकार (Unfair Rejection) पर लगाम लगेगी।

निष्कर्ष:
यह फैसला बताता है कि कानून उपभोक्ता के साथ खड़ा है। अगर आपके साथ भी “पुरानी बीमारी” का बहाना बनाकर अन्याय हुआ है, तो यह खबर आपके लिए रास्ता दिखाती है।

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