“जहां घर होना चाहिए सबसे सुरक्षित जगह, वहीं अगर डर बस जाए—तो बचपन कहां जाएगा?”
करनाल। घर की कलह से संकट में बचपन—यह अब सिर्फ एक भावनात्मक पंक्ति नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ी एक गंभीर सच्चाई बन चुकी है। बीते कुछ वर्षों में कर्नाल जिले में घर से भागने वाले बच्चों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी है, वह न सिर्फ प्रशासन बल्कि समाज के लिए भी चेतावनी है। हाल ही में बस स्टैंड पर लावारिस हालत में मिला एक बच्चा इस कड़वी हकीकत की ताजा मिसाल है। राजस्थान से भागकर आए इस बच्चे ने काउंसिलिंग में बताया कि उसके माता-पिता के बीच रोज झगड़ा होता था। घर में हर वक्त तनाव रहता था। उसे डर लगा रहता था कि कब, किस बात पर विवाद शुरू हो जाएगा। बाहर रहना उसे ज्यादा सुकून देता था। आखिरकार, उसने घर छोड़ने का फैसला कर लिया।
यह कहानी किसी एक बच्चे तक सीमित नहीं है। जिला बाल कल्याण समिति, करनाल के पास आने वाले अधिकांश मामलों में वजह एक जैसी ही सामने आ रही है—घर का बिगड़ता माहौल, माता-पिता के बीच लगातार कलह और बच्चों से टूटता संवाद।
हर साल बढ़ रही है घर छोड़ने वाले बच्चों की संख्या
जिला बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष चंद्र प्रकाश बताते हैं कि हर वर्ष 100 से अधिक बच्चे जिले के विभिन्न स्थानों—बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, ढाबों, धार्मिक स्थलों या बाजारों से संरक्षण में लिए जाते हैं। आंकड़े इस सामाजिक संकट की गहराई को साफ दिखाते हैं।
- 2022 में 142 बच्चों को संरक्षण में लिया गया
- 2023 में यह संख्या बढ़कर 179 हो गई
- 2024 में 189 बच्चे मिले
- 2025 में अब तक 236 बच्चे संरक्षण में लिए जा चुके हैं
इनमें से अधिकांश बच्चों को काउंसिलिंग और प्रक्रिया के बाद उनके परिवारों को सौंप दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि आखिर बच्चे घर छोड़ने को मजबूर क्यों हो रहे हैं?
काउंसिलिंग में खुलते हैं टूटते बचपन के राज
समिति अध्यक्ष के अनुसार, काउंसिलिंग के दौरान बच्चों की बातें सुनना बेहद पीड़ादायक होता है। अधिकांश बच्चे यही कहते हैं कि वे अपने माता-पिता के झगड़ों से तंग आ चुके थे। घर, जो सुरक्षा और अपनापन देने वाला स्थान होना चाहिए, उनके लिए डर और तनाव का केंद्र बन गया था।
राजस्थान से आए बच्चे के मामले में भी यही सामने आया। माता-पिता को बुलाकर काउंसिलिंग की गई। दोनों पक्षों को समझाया गया कि बच्चों पर घरेलू विवादों का कितना गहरा असर पड़ता है। संतोषजनक माहौल बनने के बाद बच्चे को माता-पिता के साथ भेज दिया गया।
सुविधाएं काफी नहीं, संवाद जरूरी है
काउंसिलिंग के दौरान एक और अहम बात सामने आती है—कई माता-पिता यह मान लेते हैं कि बच्चों को अच्छी पढ़ाई, कपड़े, मोबाइल और अन्य सुविधाएं देकर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी। जबकि सच्चाई यह है कि बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत समय, संवाद और भावनात्मक सुरक्षा की होती है।
समिति अध्यक्ष ने रेलवे स्टेशन पर मिली कैथल की एक बच्ची का उदाहरण दिया। बच्ची ने बताया कि उसके माता-पिता दोनों कामकाजी हैं। एकल परिवार है। घर में कोई बुजुर्ग नहीं। वह जब मां से बात करना चाहती, तो मां कहती—पापा से बात करो। पापा कहते—मां से बात करो। इस तरह वह अकेली रह गई। बाहर दोस्तों के साथ उसे अच्छा लगता था। धीरे-धीरे घर बोझ लगने लगा और उसने घर छोड़ दिया।
नशा: परिवार को तोड़ने वाला एक और बड़ा कारण
बाल कल्याण समिति के अनुसार, कई मामलों में पिता का अत्यधिक नशा भी बच्चों के घर छोड़ने का बड़ा कारण बन रहा है। शराब या अन्य नशे की लत न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति बिगाड़ती है, बल्कि घर का माहौल भी विषाक्त बना देती है। रोज-रोज का झगड़ा, हिंसा और असुरक्षा बच्चों के मन में डर पैदा कर देती है। कई बच्चे इसी डर से घर से भाग जाते हैं।
बदलता पारिवारिक ढांचा और बढ़ता अकेलापन
समाज का ढांचा तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। माता-पिता दोनों कामकाजी हैं। पहले घर में दादा-दादी या कोई न कोई ऐसा होता था, जो बच्चे की बात सुन ले, उसे समझ ले। अब वह सहारा कम होता जा रहा है। इस खालीपन का असर सबसे ज्यादा बच्चों पर पड़ रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भावनात्मक दूरी बच्चों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डाल रही है। कई बच्चे चुपचाप सब सहते रहते हैं, जबकि कुछ घर छोड़ने जैसा कठोर कदम उठा लेते हैं।
काउंसिलिंग से मिलती है नई राह
बाल कल्याण समिति की प्रक्रिया सिर्फ बच्चों को रेस्क्यू करने तक सीमित नहीं है। बच्चों के साथ-साथ माता-पिता की भी काउंसिलिंग की जाती है। उन्हें समझाया जाता है कि बच्चों के सामने झगड़ा करना, एक-दूसरे को अपशब्द कहना या हिंसा करना बच्चों के भविष्य को कैसे प्रभावित करता है।
समिति के अनुसार, ज्यादातर मामलों में काउंसिलिंग के बाद माता-पिता अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं और बच्चे को दोबारा सुरक्षित माहौल देने का भरोसा दिलाते हैं। इसके बाद ही बच्चे को परिवार को सौंपा जाता है।
| वर्ष | बचाए गए बच्चे | परिवार को सौंपे गए बच्चे |
|---|---|---|
| 2022 | 142 | 133 |
| 2023 | 179 | 173 |
| 2024 | 189 | 180 |
| 2025 | 236 | 229 |
ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या लगातार बढ़ रही है, हालांकि राहत की बात यह है कि अधिकांश बच्चों को परिवार से दोबारा जोड़ा जा सका।
ये हैं घर छोड़ने के प्रमुख कारण
- माता-पिता के बीच लगातार झगड़ा
- पिता का अत्यधिक नशा
- कामकाजी माता-पिता द्वारा समय न दे पाना
- एकल परिवारों में भावनात्मक संवाद की कमी
(स्रोत: जिला बाल कल्याण समिति)
समाज के लिए चेतावनी
यह खबर सिर्फ एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। अगर समय रहते घरों का माहौल नहीं सुधरा, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। बच्चों को सिर्फ सुविधाएं नहीं, बल्कि प्यार, समय और सुरक्षित वातावरण चाहिए।
घर की चारदीवारी के भीतर होने वाले झगड़े बच्चों के मन में ऐसे जख्म छोड़ जाते हैं, जो उम्र भर नहीं भरते। जरूरत है कि माता-पिता अपनी जिम्मेदारी को समझें और बच्चों के सामने अपने मतभेदों को हावी न होने दें।
निष्कर्ष
घर की कलह से संकट में बचपन आज एक सामाजिक सच्चाई बन चुकी है। प्रशासन और बाल कल्याण समितियां अपना काम कर रही हैं, लेकिन असली बदलाव घर से ही आएगा। जब तक घर सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक बचपन सुरक्षित नहीं हो सकता।
