बायोफ्यूल वेस्ट से बंजर होती जमीन: इंद्री के गांवों में राख, जहरीला पानी और बीमारियों का डर

बायोफ्यूल वेस्ट से बंजर होती जमीन: इंद्री के गांवों में राख, जहरीला पानी और बीमारियों का डर
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हरियाली के लिए बनी बायोफ्यूल फैक्ट्री अब खेतों को बंजर बना रही है — इंद्री के ग्रामीणों का दावा, फसलें बर्बाद और सांस लेना भी हुआ मुश्किल।

बायोफ्यूल वेस्ट से बंजर होती जमीन: इंद्री के गांवों में राख और जहरीले पानी से बढ़ी चिंता

इंद्री। बायोफ्यूल वेस्ट से बंजर होती जमीन का मुद्दा अब इंद्री क्षेत्र के कादराबाद सहित आसपास के कई गांवों में बड़ा पर्यावरणीय और सामाजिक संकट बनता जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि इंद्री-कुरुक्षेत्र रोड पर स्थित नक्षत्रा बायोफ्यूल्स प्राइवेट लिमिटेड फैक्टरी से निकलने वाला धुआं, कालिख और केमिकल युक्त पानी खेतों और आबादी तक पहुंच रहा है, जिससे न केवल कृषि प्रभावित हो रही है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। खेतों में खड़ी फसल पर गिरती राख और जमीन के अंदर जा रहे जहरीले पानी ने किसानों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है।

करीब आठ गांवों के लोग इस समस्या को लेकर कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आने वाले समय में क्षेत्र की उपजाऊ भूमि पूरी तरह से बंजर हो सकती है।

फैक्टरी से निकलती कालिख और जहरीले पानी का आरोप

ग्रामीणों के अनुसार फैक्टरी से निकलने वाला धुआं हवा में घुलकर आसपास के खेतों और घरों तक पहुंच रहा है। सड़क किनारे काली राख के ढेर जमा हैं, जो वाहनों के गुजरने से उड़कर वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि यह राख गेहूं और सब्जियों की फसल पर गिर रही है, जिससे दानों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

साथ ही फैक्टरी से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी सीधे खेतों में जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि कई जगहों पर गंदा पानी सड़क पर छोड़ा जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता तेजी से घट रही है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि औद्योगिक अपशिष्ट का सही तरीके से निस्तारण नहीं किया गया तो मिट्टी की संरचना स्थायी रूप से खराब हो सकती है। इससे आने वाले वर्षों में उत्पादन घटने की संभावना है।

प्रदर्शन और बढ़ता आक्रोश

समस्या को लेकर ग्रामीणों ने दो बार फैक्टरी के सामने धरना-प्रदर्शन किया है। बुधवार को भी करीब दो घंटे तक हंगामा हुआ, जिसमें आठ गांवों के लोगों ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया।

ग्रामीणों का कहना है कि प्रदूषण की वजह से बच्चों और बुजुर्गों में सांस और आंखों से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई लोगों ने दमा जैसी शिकायतों होने की बात कही है।

10 एकड़ में खड़ी फसल हुई खराब

फैक्टरी के पीछे 12 एकड़ जमीन ठेके पर लेकर खेती कर रहे किसान अंग्रेज सिंह ने बताया कि फैक्टरी का रसायनयुक्त पानी उनके खेतों में छोड़ा गया, जिससे 10 एकड़ में खड़ी धान की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। उन्होंने बताया कि 80 हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन ठेके पर ली थी, लेकिन नुकसान की भरपाई नहीं हो पाई।

अंग्रेज सिंह के अनुसार शिकायत करने पर फैक्टरी प्रबंधन ने केवल 25 हजार रुपये देकर मामला शांत करने की कोशिश की। उनका आरोप है कि जहरीले पानी के कारण जमीन की उपजाऊ शक्ति खत्म होती जा रही है और भविष्य में खेती करना मुश्किल हो सकता है।

फैक्टरी का प्रोफाइल और उत्पादन क्षमता

11 एकड़ भूमि पर बनी नक्षत्रा बायोफ्यूल्स फैक्टरी 120 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता वाली ग्रेन-बेस्ड डिस्टिलरी है, जहां इथेनॉल का उत्पादन किया जाता है। यह इथेनॉल पेट्रोल और डीजल में मिलाया जाता है, जिससे ईंधन की लागत और प्रदूषण कम करने का लक्ष्य रखा गया है।

मई 2025 में हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने इसका उद्घाटन किया था। कंपनी का पंजीकरण 10 अगस्त 2021 को दिल्ली में हुआ था। सरकार की बायोफ्यूल नीति के तहत इस तरह की फैक्ट्रियों को पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीन और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ग्रामीणों की जुबानी दर्द

तैयार फसल पर राख
ग्रामीण विजय चोपड़ा का कहना है कि खेतों में गेहूं की फसल पकने को तैयार है, लेकिन फैक्टरी से निकलने वाली काली राख दानों पर गिर रही है। उनका सवाल है कि जब यही अनाज लोग खाएँगे तो स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा।

बीमारियों का खतरा बढ़ा
कुलदीप सिंह ने बताया कि खेतों में लगाई गई सब्जियां खराब हो रही हैं। जमीन के ऊपर राख और नीचे जहरीला पानी भविष्य में बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकते हैं।

फैक्टरी प्रबंधन का पक्ष

नक्षत्रा बायोफ्यूल्स की निदेशक अंकिता अग्रवाल ने कहा कि समस्या की जांच के लिए बायलर लगाने वाली कंपनी के इंजीनियरों को बुलाया गया है। उनका दावा है कि दो दिनों में तकनीकी खामियां दूर कर दी जाएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ग्रामीणों और किसानों को आगे भी समस्या आती है तो बैठक कर समाधान निकाला जाएगा।

पर्यावरण और कृषि विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि इथेनॉल उत्पादन पर्यावरण के लिए जरूरी है, लेकिन अपशिष्ट प्रबंधन में लापरवाही बड़े संकट का कारण बन सकती है। यदि राख और केमिकल युक्त पानी का सही उपचार नहीं हुआ तो मिट्टी की जैविक संरचना खराब हो सकती है। इससे भूजल भी प्रभावित होने की संभावना रहती है।

प्रशासन की भूमिका और आगे की राह

स्थानीय प्रशासन के लिए यह मामला चुनौती बनता जा रहा है। ग्रामीणों की मांग है कि स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए और प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए। यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ तो बड़े स्तर पर आंदोलन होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

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