जो महिलाएं कल तक चुप थीं, आज सवाल पूछ रही हैं। जो सहती थीं, अब सहने से इनकार कर रही हैं।
घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता अब सिर्फ शब्द नहीं, एक आंदोलन बन रही है…
करनाल।
घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता में बीते कुछ वर्षों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बदलाव केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मविश्वास, सोच और निर्णय लेने की क्षमता में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। अब महिलाएं केवल सहने के लिए मजबूर नहीं हैं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति सजग होकर हिंसा के खिलाफ आवाज उठा रही हैं।
एक समय था जब घरेलू हिंसा के मामलों में शिकायतें अधिकतर पड़ोसियों, रिश्तेदारों या सामाजिक संगठनों के माध्यम से सामने आती थीं। पीड़ित महिला खुद सामने आने से कतराती थी—कभी सामाजिक बदनामी के डर से, तो कभी बच्चों और परिवार के भविष्य की चिंता में। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। करनाल जिले के सुकून केंद्र में पहुंचने वाली महिलाओं का प्रोफाइल इस बदलाव का सबसे सशक्त प्रमाण है।
चुप्पी से संवाद तक का सफर
जिला स्तर पर संचालित सुकून केंद्र में बीते कुछ महीनों में घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में निरंतर वृद्धि देखी गई है। जिला काउंसलर अन्नू के अनुसार, “अब महिलाएं खुद आगे आकर अपनी पीड़ा साझा कर रही हैं। वे समझने लगी हैं कि हिंसा केवल मारपीट तक सीमित नहीं होती।”
उनका कहना है कि केंद्र में हर माह औसतन तीन से चार महिलाएं ऐसी पहुंच रही हैं, जो पहली बार अपने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर अपने लिए आवाज उठा रही हैं। यह संख्या भले ही देखने में कम लगे, लेकिन सामाजिक संरचना के लिहाज से यह एक बड़ा बदलाव है।
मानसिक प्रताड़ना भी हिंसा है
अक्सर घरेलू हिंसा को केवल शारीरिक मारपीट से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन सुकून केंद्र में आने वाले मामलों की प्रकृति इससे कहीं व्यापक है।
महिलाएं मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक नियंत्रण, यौन शोषण, भावनात्मक उपेक्षा और धमकियों जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर केंद्र तक पहुंच रही हैं।
काउंसलर अन्नू बताती हैं, “कई महिलाएं ऐसी होती हैं जिनकी कोई सुनवाई नहीं होती। घर में उनकी बात को महत्व नहीं दिया जाता। धीरे-धीरे वे मानसिक तनाव, अवसाद और आत्मग्लानि का शिकार हो जाती हैं। सुकून केंद्र उनके लिए पहली ऐसी जगह बनता है, जहां उन्हें बिना जज किए सुना जाता है।”
बच्चों के लिए रिश्ता बचाने की कोशिश, पर आत्मसम्मान से समझौता नहीं
केंद्र में पहुंचने वाली अधिकांश महिलाएं यह स्वीकार करती हैं कि उन्होंने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए लंबे समय तक हिंसा को सहा।
वे रिश्ता बचाना चाहती थीं, परिवार को टूटने से रोकना चाहती थीं। लेकिन एक सीमा के बाद मानसिक प्रताड़ना असहनीय हो जाती है।
अब महिलाएं यह समझने लगी हैं कि बच्चों के लिए केवल एक साथ रहना ही जरूरी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण भी उतना ही आवश्यक है।
केस स्टडी 1
शादी के कुछ महीनों बाद ही शुरू हो गई प्रताड़ना
34 वर्षीय महिला सुकून केंद्र में उस समय पहुंचीं, जब उनके आत्मविश्वास की हालत बेहद कमजोर थी।
शादी के कुछ ही महीनों बाद पति द्वारा कम दहेज लाने के ताने दिए जाने लगे। यह ताने धीरे-धीरे मारपीट, गाली-गलौज और बच्चों के सामने धमकियों में बदल गए।
दो छोटे बच्चों के कारण महिला लंबे समय तक चुप रहीं। लेकिन जब मानसिक तनाव ने उनकी सेहत और बच्चों के व्यवहार पर असर डालना शुरू किया, तब उन्होंने सुकून केंद्र का रुख किया।
काउंसलिंग के बाद महिला को यह समझाया गया कि हिंसा सहना मजबूरी नहीं है। उन्हें कानूनी सहायता दी गई और आत्मनिर्भर बनने के लिए मार्गदर्शन भी किया गया।
आज वह महिला न केवल अपने बच्चों के साथ सुरक्षित जीवन जी रही हैं, बल्कि कानूनी लड़ाई भी मजबूती से लड़ रही हैं।
केस स्टडी 2
आर्थिक नियंत्रण भी हिंसा का ही एक रूप
28 वर्षीय महिला एक निजी कंपनी में कार्यरत थीं। शादी के बाद पति ने यह कहकर नौकरी छुड़वा दी कि “घर की जिम्मेदारी संभालो।”
इसके बाद हर खर्च का हिसाब मांगा जाने लगा। मायके या दोस्तों से मिलने पर पाबंदियां लगा दी गईं।
जब महिला ने इसका विरोध किया, तो मानसिक प्रताड़ना और धमकियों का सिलसिला शुरू हो गया।
सुकून केंद्र की काउंसलिंग के दौरान महिला को यह समझाया गया कि आर्थिक नियंत्रण भी घरेलू हिंसा का गंभीर रूप है।
उन्हें कानूनी सलाह दी गई और मानसिक स्वास्थ्य सुधार के लिए चिकित्सकीय सहायता भी उपलब्ध कराई गई।
आज महिला दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।
कानून और सहायता की जानकारी जरूरी
घरेलू हिंसा के खिलाफ भारत में सशक्त कानून मौजूद हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण महिलाएं इनका लाभ नहीं उठा पातीं। सुकून केंद्र जैसे संस्थान इस खाई को पाटने का काम कर रहे हैं—जहां कानूनी, मानसिक और सामाजिक सहायता एक साथ मिलती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती स्तर पर ही काउंसलिंग और सहायता मिल जाए, तो कई मामलों में स्थिति को संभाला जा सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ता फोकस
घरेलू हिंसा केवल शरीर पर नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है। लंबे समय तक हिंसा झेलने वाली महिलाएं अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी से जूझती हैं।
सुकून केंद्र में मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जा रही है। महिलाओं को यह समझाया जाता है कि मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है।
समाज के लिए संकेत
घरेलू हिंसा के खिलाफ बढ़ती जागरूकता समाज के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यह बदलाव केवल महिलाओं की वजह से नहीं, बल्कि प्रशासन, काउंसलिंग केंद्रों और सामाजिक सोच में आए परिवर्तन का भी परिणाम है।
जरूरत इस बात की है कि इस जागरूकता को गांव-गांव, घर-घर तक पहुंचाया जाए, ताकि कोई भी महिला खुद को अकेला न महसूस करे।
निष्कर्ष
आज की महिला चुप नहीं है। वह सवाल पूछ रही है, अधिकार मांग रही है और हिंसा को हिंसा कहने का साहस दिखा रही है।
घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता अब एक खबर नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की कहानी बनती जा रही है। और यही बदलाव आने वाले समय में एक सुरक्षित, संवेदनशील और समान समाज की नींव रखेगा।
