जहां जुनून हो मजबूत, वहां जीत तय है: झज्जर के हितेश की कहानी
हरियाणा की मिट्टी में खेल प्रतिभाओं की कभी कमी नहीं रही है। कुश्ती से लेकर कबड्डी और मुक्केबाज़ी तक, यहां के खिलाड़ी देश-दुनिया में अपनी पहचान बनाते आए हैं। इसी कड़ी में झज्जर जिले के छोटे से गांव जहांगीरपुर से निकलकर एक नाम अब अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी की दुनिया में चमक रहा है—20 वर्षीय हितेश गुलिया। जिसने अपने बढ़ते वजन से परेशान होकर जिस बॉक्सिंग रिंग में कदम रखा था, उसी रिंग में आज वो इतिहास रच रहे हैं।
ब्राज़ील में पहली बार आयोजित हुए वर्ल्ड बॉक्सिंग कप में 70 किलोग्राम भार वर्ग में गोल्ड मेडल जीतकर हितेश गुलिया ने देश के लिए पहला स्वर्ण पदक हासिल किया है। यह न केवल भारत बल्कि हरियाणा के लिए भी गर्व का क्षण है।
बचपन में था 55 किलो वजन, पिता ने दिया बॉक्सिंग का रास्ता
साल 2014, महज 11 साल की उम्र और 55 किलो से अधिक वजन—एक ऐसा दौर जब बच्चे खेलते-कूदते हैं, लेकिन झज्जर के महर्षि दयानंद सरस्वती स्टेडियम में एक बच्चा वजन कम करने के लिए पंच मार रहा था। यह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि हितेश गुलिया था।
हितेश गुलिया के पिता सत्यवान गुलिया, जो पेशे से ठेकेदार हैं, बेटे की सेहत को लेकर चिंतित थे। डॉक्टरों की सलाह के बाद उन्होंने हितेश को खेलों की ओर मोड़ा और खुद की निगरानी में बॉक्सिंग में उतारा।
कोच हितेश देसवाल की देखरेख में हुई शुरुआत
हितेश गुलिया की प्रतिभा को निखारने का जिम्मा उठाया कोच हितेश देसवाल ने। उन्होंने न केवल टेक्निक सिखाई बल्कि मानसिक रूप से भी तैयार किया। कोच देसवाल के अनुसार, हितेश शुरुआत से ही जिद्दी और मेहनती थे। उन्होंने बहुत ही कम समय में पंचिंग की बारीकियों को समझा और अभ्यास में कोई कमी नहीं छोड़ी।
पहली जीत ने बढ़ाया आत्मविश्वास, फिर नहीं रुके हितेश
बॉक्सिंग की शुरुआत सिर्फ फिटनेस के लिए थी, लेकिन जब 2018 में हितेश ने हरियाणा स्कूल स्टेट चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता, तो परिवार और कोच को एहसास हुआ कि इसमें कुछ खास बात है।
इस जीत ने हितेश का आत्मविश्वास बढ़ा दिया और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2019 में अंडर-17 एसजीएफआई (SGFI) मिजोरम प्रतियोगिता में रजत पदक जीतकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।
भारतीय नौसेना में चयन बना टर्निंग पॉइंट
15 जनवरी 2022 को हितेश गुलिया ने भारतीय नौसेना में भर्ती होकर न केवल अपना भविष्य सुरक्षित किया, बल्कि मुक्केबाजी में नया मुकाम भी हासिल किया। अब वो सर्विसेज की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
सर्विसेज में शामिल होने के बाद उन्होंने ऑल इंडिया सर्विसेज प्रतियोगिता में भाग लिया और अपने वर्ग में शीर्ष स्थान हासिल किया। यही नहीं, उन्होंने वर्ल्ड मिलिट्री गेम्स में भी भारत के लिए पदक जीतकर सेना और देश का सिर ऊँचा किया।
ब्राज़ील में रचा इतिहास: पहली बार आयोजित वर्ल्ड बॉक्सिंग कप में गोल्ड
2025 की शुरुआत में जब ब्राज़ील में पहली बार वर्ल्ड बॉक्सिंग कप का आयोजन हुआ, तो भारत की नज़रें अपने युवा मुक्केबाज़ों पर थीं। हितेश गुलिया ने वहां 70 किग्रा भार वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को प्रतियोगिता का पहला गोल्ड मेडल दिलाया।
उनकी फुर्ती, पंचिंग टेक्निक और रणनीतिक समझ ने उन्हें फाइनल तक पहुंचाया, जहां उन्होंने कड़े मुकाबले में प्रतिद्वंद्वी को हराकर स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया।
हितेश की कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ
| तारीख | प्रतियोगिता | स्थान/स्तर | पदक |
|---|---|---|---|
| 16 सितंबर 2018 | हरियाणा स्कूल स्टेट चैंपियनशिप | झज्जर | स्वर्ण |
| 19 नवंबर 2019 | अंडर-17 SGFI | मिजोरम | रजत |
| 15 जनवरी 2022 | भारतीय नौसेना में भर्ती | देश सेवा | — |
| 18 सितंबर 2024 | सर्विसेज राष्ट्रीय प्रतियोगिता | भारत | स्वर्ण |
| 6 जनवरी 2025 | बरेली ओपन टूर्नामेंट | उत्तर प्रदेश | स्वर्ण |
| 2025 | वर्ल्ड बॉक्सिंग कप | ब्राज़ील | स्वर्ण |
परिवार बना सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम
हितेश के चार भाई-बहनों में वो सबसे छोटे हैं। परिवार ने शुरुआत में उनकी बॉक्सिंग को सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने का माध्यम माना, लेकिन जैसे-जैसे सफलता मिलती गई, पूरा परिवार हितेश के साथ खड़ा हो गया।
पिता सत्यवान गुलिया हर मुकाबले में साथ जाते हैं, माँ हर दिन उनके लिए हेल्दी डाइट तैयार करती हैं, और भाई-बहन सोशल मीडिया पर उनके लिए सपोर्ट दिखाते हैं।
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कोच देसवाल की सोच: “हितेश में ओलंपिक मैडल की पूरी काबिलियत”
कोच हितेश देसवाल का मानना है कि आने वाले ओलंपिक में हितेश भारत के लिए पदक जीत सकते हैं। “उसके पंच में ताकत है, सोच में परिपक्वता है और मेहनत में जुनून। वह एक दिन ओलंपिक चैंपियन जरूर बनेगा,” कोच ने कहा।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
हितेश की यह कहानी केवल एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि हर उस युवा की प्रेरणा है जो शारीरिक परेशानी से जूझ रहा है या आत्मविश्वास की कमी महसूस करता है। 11 साल की उम्र में जिस लड़के ने वजन कम करने के लिए बॉक्सिंग शुरू की थी, वही अब दुनिया के नक्शे पर भारत का नाम ऊँचा कर रहा है।
निष्कर्ष: मेहनत और आत्मविश्वास का दूसरा नाम—हितेश गुलिया
हितेश गुलिया ने साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो, मेहनत में कोई कमी न हो, और साथ में एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम हो—तो कोई भी बाधा रास्ते की दीवार नहीं बन सकती। उनका यह सफर यहीं नहीं रुकेगा, अब अगला लक्ष्य ओलंपिक है, और पूरा देश उन्हें उस मुकाम तक पहुँचते देखने को उत्सुक है।
