बच्चों में सोशल मीडिया की लत: लाइक-व्यूज की दौड़ में उलझता बचपन

बच्चों में सोशल मीडिया की लत: लाइक-व्यूज की दौड़ में उलझता बचपन
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मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां चल रही हैं, आंखें लाइक गिन रही हैं और बचपन चुपचाप पीछे छूट रहा है…

बच्चों में सोशल मीडिया की लत अब केवल शहरी चिंता नहीं रही, बल्कि यह हर घर और हर स्कूल तक पहुंच चुकी एक गंभीर मानसिक और सामाजिक समस्या बनती जा रही है। रील बनाने और देखने का चलन बच्चों में इस कदर बढ़ गया है कि अब उनके दिन की शुरुआत और अंत मोबाइल स्क्रीन पर दिखने वाले लाइक, व्यूज और कमेंट्स से तय होने लगा है। रील अपलोड करने के बाद फोन बार-बार चेक करना, कम लाइक मिलने पर बेचैनी और निराशा, और ज्यादा व्यूज पाने की उम्मीद में लगातार नई रील बनाने का दबाव—यह सब मिलकर बचपन को तनाव और असुरक्षा की गिरफ्त में धकेल रहा है।

रील कल्चर और बचपन का बदलता चेहरा

कुछ साल पहले तक बच्चों की पहचान उनके खेल, पढ़ाई, कला या दोस्तों से होती थी। आज वही पहचान इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक वीडियो से जुड़ती जा रही है। मोबाइल कैमरा ऑन होते ही बच्चा कलाकार बन जाता है और अपलोड बटन दबाते ही जजमेंट की दुनिया में कदम रख देता है।
लाइक मिले तो खुशी, न मिले तो चुप्पी और चिड़चिड़ापन—यह भावनात्मक उतार-चढ़ाव अब 8 से 15 साल के बच्चों में भी आम होता जा रहा है।

मनोचिकित्सकों की चेतावनी: यह सिर्फ आदत नहीं, संकेत है

जिला नागरिक अस्पताल से मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य कौशिक बताते हैं कि सोशल मीडिया ने बच्चों के रोजमर्रा के जीवन पर सीधा और गहरा असर डालना शुरू कर दिया है।
उनके अनुसार, “रील अपलोड करने के बाद बच्चों में तुरंत प्रतिक्रिया पाने की उम्मीद बन जाती है। वे बार-बार फोन चेक करते हैं—कितने व्यूज आए, किसने कमेंट किया। यह व्यवहार धीरे-धीरे लत का रूप ले लेता है।”

डॉ. कौशिक बताते हैं कि हर महीने 20 से 25 बच्चे ओपीडी में ऐसी ही समस्याओं के साथ पहुंच रहे हैं, जिनमें—

  • लगातार बेचैनी
  • नींद की कमी
  • पढ़ाई में मन न लगना
  • चिड़चिड़ापन
  • आत्मविश्वास में गिरावट

जैसी समस्याएं प्रमुख हैं।
उनका साफ कहना है—“आने वाले समय में यह एक बड़ी मानसिक स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है।”

सीखने की प्रक्रिया पर सीधा असर

डीएवी कॉलेज से मनोवैज्ञानिक सहायक प्रोफेसर कोमल का मानना है कि रील और सोशल मीडिया की लत बच्चों के मानसिक विकास और रचनात्मक क्षमता पर गंभीर असर डाल रही है।
वे कहती हैं, “जब बच्चे का ध्यान बार-बार स्क्रीन, लाइक और फॉलोअर्स पर जाता है, तो उसकी सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है। वह गहराई से सोचने, पढ़ने और समझने की क्षमता खोने लगता है।”

धीरे-धीरे यह स्थिति—

  • एकाग्रता की कमी
  • स्मरण शक्ति में गिरावट
  • कल्पनाशीलता में कमी

जैसी समस्याओं को जन्म देती है, जो आगे चलकर शैक्षणिक प्रदर्शन और सामाजिक व्यवहार दोनों को प्रभावित करती हैं।

स्कूलों में दिख रहा असर

निसिंग के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य सुरेश सैनी कहते हैं कि बच्चों को समय रहते यह समझाना बेहद जरूरी है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन है, उनकी प्रतिभा और क्षमता का पैमाना नहीं
उनका कहना है, “आज कई बच्चे खुद को रील्स में दिखने वाले बच्चों से तुलना करने लगे हैं। इससे उनमें हीन भावना पैदा होती है।”

रामनगर स्थित एसडी बाल मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य दिनेशचंद्र डिमरी बताते हैं कि रील और गेम की लत बच्चों के व्यवहार में साफ दिखाई देने लगी है।
“बच्चे जल्दी गुस्सा करने लगे हैं, बात-बात पर चिड़ जाते हैं। खुद की तुलना दूसरों से करने लगे हैं। यह आत्मविश्वास को कमजोर करता है,” वे कहते हैं।

लाइक-व्यूज का मनोविज्ञान

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह बार-बार उपयोगकर्ता को लौटने के लिए मजबूर करे।
बच्चों का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है। जब उन्हें लाइक और व्यूज के रूप में तुरंत इनाम मिलता है, तो दिमाग डोपामिन रिलीज करता है। यही कारण है कि—

  • बच्चा बार-बार वही अनुभव चाहता है
  • फोन से दूरी बनाने पर बेचैनी होती है
  • वास्तविक दुनिया उबाऊ लगने लगती है

यह स्थिति धीरे-धीरे मानसिक निर्भरता में बदल जाती है।

अभिभावकों की भूमिका क्यों है अहम

विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों में सोशल मीडिया की लत को रोकने में सबसे बड़ी भूमिका अभिभावकों की है।
अगर माता-पिता खुद हर समय मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों को रोकना मुश्किल हो जाता है।

आज जरूरत है—

  • संवाद की
  • समय देने की
  • उदाहरण पेश करने की

बच्चों को यह महसूस कराना जरूरी है कि उनकी पहचान लाइक और फॉलोअर्स से नहीं, बल्कि उनके गुण, मेहनत और सोच से बनती है।

निष्कर्ष

लाइक, सब्सक्राइब और व्यूज की यह दौड़ भले ही वर्चुअल हो, लेकिन इसके असर बिल्कुल वास्तविक हैं। अगर आज समय रहते बच्चों में सोशल मीडिया की लत को नहीं समझा और संभाला गया, तो आने वाली पीढ़ी भावनात्मक रूप से कमजोर और मानसिक रूप से अस्थिर हो सकती है।
बचपन को स्क्रीन से बाहर निकालना अब विकल्प नहीं, जरूरत बन चुका है।

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