करनाल में बुजुर्ग पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर | Pension Problem in Karnal

करनाल में बुजुर्ग पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर | Pension Problem in Karnal
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जिस उम्र में बुजुर्गों को सहारे की ज़रूरत होती है, उसी उम्र में वे पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। सवाल ये है कि क्या करनाल में बुजुर्गों की पेंशन सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गई है?

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करनाल। बुजुर्ग पेंशन समस्या करनाल में अब एक गंभीर सामाजिक संकट का रूप लेती जा रही है। सरकार जहां एक ओर बुजुर्गों, विधवाओं और निराश्रितों को सम्मानजनक जीवन देने के उद्देश्य से पेंशन योजनाएं चला रही है, वहीं जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। पेंशन विभाग के कार्यालयों में हर रोज बुजुर्गों की भीड़ देखने को मिलती है, जो कभी पेंशन न आने, कभी खाते में राशि अटकने तो कभी दस्तावेजों में मामूली त्रुटियों को लेकर भटकते नजर आते हैं।

सरकारी योजनाओं का मकसद बुजुर्गों को आर्थिक सहारा देना है, लेकिन करनाल जिले में यह सहारा खुद एक संघर्ष बन चुका है। पेंशन से जुड़ी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए बुजुर्गों को बार-बार कार्यालय बुलाया जाता है और हर बार उन्हें किसी न किसी बहाने से एक काउंटर से दूसरे काउंटर और एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक भेज दिया जाता है।

हर रोज बढ़ रही बुजुर्गों की भीड़, समाधान शून्य

पेंशन विभाग के कार्यालय के बाहर सुबह से ही बुजुर्गों की कतार लग जाती है। इनमें से कई ऐसे हैं जो लाठी के सहारे चलते हैं, तो कई ऐसे भी हैं जिनकी आंखों की रोशनी कमजोर हो चुकी है। कोई बेटे के सहारे आया है, तो कोई पड़ोसी की मदद से। लेकिन दफ्तर के भीतर जाने के बाद इन्हें जो मिलता है, वह है – टालमटोल, बहाने और अनिश्चितता

बुजुर्गों का कहना है कि हर बार कर्मचारी उनसे कहते हैं –
“आज सिस्टम नहीं चल रहा”, “कल आना”, “दूसरे ब्लॉक जाओ”, “बैंक से कागज लाओ”

सरकारी योजनाएं कागजों में, ज़मीन पर अफसरशाही

सरकार ने बुजुर्गों और विधवाओं के लिए पेंशन को उनका अधिकार बताया है। इसके लिए आधार, बैंक खाते और पहचान पत्र जैसी प्रक्रियाएं पहले ही पूरी करवाई जाती हैं। बावजूद इसके, जब पेंशन शुरू होने या जारी रहने की बात आती है, तो वही प्रक्रियाएं बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी बाधा बन जाती हैं।

केस स्टडी – 1

तीन महीने से पेंशन के लिए भटक रही विमला देवी

गांव खोसला से आई बुजुर्ग महिला विमला देवी की आंखों में आंसू और चेहरे पर थकान साफ झलकती है। उन्होंने बताया कि छह महीने पहले उनके पति का देहांत हो गया था। पति की मृत्यु के बाद विधवा पेंशन ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा है।

विमला देवी बताती हैं,

“मेरे सभी कागजों में नाम विमला देवी है, लेकिन वोटर कार्ड में गलती से निर्मला देवी दर्ज हो गया। बस इसी एक गलती की वजह से तीन महीने से पेंशन नहीं मिल रही।”

उन्होंने कहा कि पेंशन विभाग के कर्मचारी कभी उन्हें नीलोखेड़ी भेज देते हैं तो कभी किसी और ब्लॉक। हर बार कहा जाता है कि पहले नाम ठीक करवाओ, फिर पेंशन मिलेगी।

“मैं बुजुर्ग हूं, इतना चल नहीं सकती। कर्मचारी हमारी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं,” – विमला देवी ने कहा।

केस स्टडी – 2

70 वर्षीय धनपति की आखिरी उम्मीद भी खतरे में

बाल पबाना गांव से आईं 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला धनपति पिछले तीन महीनों से पेंशन न आने से परेशान हैं। उनके पति का कुछ महीने पहले निधन हो गया था। पति की मृत्यु के बाद घर चलाने का एकमात्र जरिया पेंशन ही है।

धनपति बताती हैं,

“कर्मचारी कहते हैं कि मेरा बैंक खाता बंद है, इसलिए पेंशन नहीं आ रही। जबकि मेरा खाता गांव की केनरा बैंक शाखा में चालू है।”

उन्होंने कई बार बैंक जाकर भी इसकी पुष्टि करवाई, लेकिन पेंशन विभाग उनकी बात मानने को तैयार नहीं।

“पेंशन नहीं आएगी तो मैं खाऊंगी क्या?” – यह सवाल धनपति की आंखों से छलकते आंसुओं में साफ दिखता है।

बुजुर्गों की मजबूरी बन रही है व्यवस्था की कमजोरी

इन दोनों मामलों से साफ है कि बुजुर्ग पेंशन समस्या करनाल केवल तकनीकी नहीं बल्कि संवेदनशीलता की कमी का मामला है। जहां एक ओर डिजिटल सिस्टम को आसान बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर डिजिटल प्रक्रियाएं बुजुर्गों के लिए नई परेशानी बनती जा रही हैं।

विशेषज्ञों की राय

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेंशन जैसी योजनाओं के लिए सिंगल विंडो सिस्टम होना चाहिए, ताकि बुजुर्गों को अलग-अलग विभागों के चक्कर न काटने पड़ें। साथ ही, विभागीय कर्मचारियों को बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील बनाने की जरूरत है।

क्या कहता है कानून?

प्रश्न: बुजुर्गों को पेंशन न मिले तो क्या करें?
उत्तर: बुजुर्ग पेंशन न मिलने की स्थिति में संबंधित पेंशन कार्यालय, जिला समाज कल्याण अधिकारी और हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज की जा सकती है।

प्रश्न: नाम या बैंक खाते की गलती कैसे सुधारे?
उत्तर: आधार और बैंक रिकॉर्ड सही कराकर पेंशन विभाग में लिखित आवेदन देना जरूरी है।

निष्कर्ष

करनाल में बुजुर्ग पेंशन समस्या करनाल अब सिर्फ एक विभागीय चूक नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का आईना बन चुकी है। जरूरत इस बात की है कि सरकार की मंशा और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को पाटा जाए, ताकि बुजुर्ग अपने हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर न हों।

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