संजय शर्मा, करनाल।
फास्ट ट्रैक स्पेशल पॉक्सो अदालत ने नाबालिग साली से दुष्कर्म और गर्भपात कराने के घिनौने मामले में तीन दोषियों को कठोर सजा सुनाई है। अतिरिक्त सेशन जज रेनू राणा की अध्यक्षता वाली अदालत ने तीनों आरोपियों को अलग-अलग सजा और जुर्माने का आदेश दिया है। यह मामला 2021 में हरियाणा के घरौंडा थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया था। अदालत ने इसे समाज के लिए चेतावनी बताते हुए दोषियों को दंडित किया है।
कैसे सामने आया मामला?
2021 में करनाल जिले के घरौंडा थाना में एक महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ हुए अपराध की शिकायत दर्ज कराई थी। महिला ने बताया कि उसका पति अब इस दुनिया में नहीं है, और वह छह बेटियों के साथ अपना जीवन यापन कर रही है।
दुष्कर्म का आरोप
- महिला ने आरोप लगाया कि उसकी बड़ी बेटी का पति और यूपी के कैराना निवासी अशफाक ने उसकी नाबालिग बेटी (साली) को अपनी हवस का शिकार बनाया।
- दुष्कर्म के कारण नाबालिग गर्भवती हो गई।
गर्भपात की साजिश
- अशफाक के भाई मेहताब और उसकी पत्नी सन्नों ने इस अपराध को छिपाने की कोशिश की।
- दोनों ने यूपी में एक डॉक्टर के जरिए पीड़िता का जबरन गर्भपात कराया।
पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारी
महिला की शिकायत पर हरियाणा पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की।
- अशफाक, मेहताब और सन्नों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
- पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया।
- सभी सबूत और पीड़िता के बयान कोर्ट में पेश किए गए।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई
- मामला फास्ट ट्रैक स्पेशल पॉक्सो अदालत में पहुंचा।
- अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद तीनों दोषियों को दोषी करार दिया।
दोषियों को मिली कठोर सजा
अदालत ने तीनों दोषियों के लिए अलग-अलग सजा का ऐलान किया।
अशफाक को 20 साल की सजा
- अदालत ने दुष्कर्म के मुख्य आरोपी अशफाक को 20 साल की कठोर सजा सुनाई।
- इसके अलावा, उस पर ₹30,000 का जुर्माना भी लगाया गया।
- अदालत ने इसे मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए कड़ी टिप्पणी की।
मेहताब और सन्नों को 10-10 साल की सजा
- अशफाक के भाई मेहताब और उसकी पत्नी सन्नों को नाबालिग का गर्भपात कराने का दोषी पाया गया।
- दोनों को 10-10 साल की सजा सुनाई गई।
- मेहताब पर ₹20,000 और सन्नों पर ₹15,000 का जुर्माना भी लगाया गया।
अदालत का संदेश: समाज के लिए चेतावनी
फैसला सुनाते हुए जज रेनू राणा ने कहा कि यह मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है।
- ‘दुष्कर्म और गर्भपात जैसे अपराध अक्षम्य’:
जज ने टिप्पणी की कि ऐसे अपराधों के लिए कठोरतम दंड जरूरी है, ताकि समाज में इसका एक सख्त संदेश जाए। - अदालत ने यह भी कहा कि कानून को पीड़ितों की रक्षा के लिए और अधिक सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
पीड़िता और परिवार की दास्तान
इस घटना के बाद पीड़िता और उसका परिवार मानसिक और सामाजिक दोनों प्रकार के अत्याचारों का सामना कर रहा है।
- मानसिक आघात:
- नाबालिग लड़की को अपने ही परिवार के रिश्तेदार से इस तरह के शोषण का सामना करना पड़ा।
- गर्भपात की जबरदस्ती ने उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को और भी खराब कर दिया।
- सामाजिक चुनौतियां:
- परिवार को समाज में शर्मिंदगी और कलंक का सामना करना पड़ा।
- पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच यह मामला चर्चा का विषय बन गया।
पॉक्सो एक्ट का प्रभाव
इस मामले में पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस) एक्ट की अहम भूमिका रही।
- कानून ने यह सुनिश्चित किया कि मामले की जांच और सुनवाई तेजी से हो।
- दोषियों को जल्द सजा मिलना इस कानून की सफलता को दर्शाता है।
पॉक्सो एक्ट के तहत क्या प्रावधान हैं?
- पॉक्सो एक्ट नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को रोकने के लिए बनाया गया है।
- इसमें दोषियों के लिए कठोर सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
समाज में अपराध के खिलाफ जागरूकता की जरूरत
यह घटना दिखाती है कि समाज में रिश्तों की मर्यादा और नैतिकता पर कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
- परिवारों को सतर्क रहने की जरूरत:
- बच्चों की सुरक्षा के लिए माता-पिता और अभिभावकों को सतर्क रहना होगा।
- बच्चों के व्यवहार और परिवेश पर ध्यान देना जरूरी है।
- सरकार और संस्थाओं की भूमिका:
- सरकार को बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए।
- स्कूलों और सामाजिक संगठनों को इस मुद्दे पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
न्यायपालिका का रुख सराहनीय
अदालत का यह फैसला समाज में एक उदाहरण स्थापित करता है।
- न्यायपालिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बच्चों के खिलाफ अपराध किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।
- इस फैसले से अपराधियों में डर पैदा होगा और पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद जगेगी।
निष्कर्ष: सख्त सजा से मिलेगा न्याय
करनाल की इस घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। लेकिन फास्ट ट्रैक कोर्ट का यह फैसला दिखाता है कि न्याय की प्रक्रिया सक्रिय है।
- पीड़िता और उसके परिवार के लिए यह सजा राहत का काम करेगी।
- साथ ही, यह फैसला समाज को अपराध के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देगा।
- अब यह देखना जरूरी है कि सरकार और समाज मिलकर ऐसे अपराधों को जड़ से खत्म करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
