ED ने अरविंद केजरीवाल को PMLA में किया गया अरेस्ट, लेकिन क्यों बेल नहीं?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पीएमएलए के तहत गिरफ्तार
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कानून के अनुसार, धारा 45 में आरोपी को जमानत के लिए दो कठोर शर्तें हैं। पीएमएलए (PMLA) के तहत सभी अपराध गैर जमानती होंगे और अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है। ईडी को कुछ शर्तों के साथ बिना वारंट आरोपी के परिसरों की तलाशी लेने और उसे गिरफ्तार करने का अधिकार है, संपत्ति की जब्ती और कुर्की का अधिकार है।

ईडी ने गुरुवार को शराब घोटाले के मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के सिलसिले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पीएमएलए के तहत गिरफ्तार किया। उन्हें आज स्पेशल पीएमएलए कोर्ट में पेश किया जाएगा, जहां ईडी पूछताछ के लिए उनकी हिरासत की मांग करेगी। दिल्ली के सीएम ने इस गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत आज इस मामले पर सुनवाई करेगी।

वास्तव में, ईडी ने अरविंद केजरीवाल को Prevention of Money Laundering Act, 2002 के तहत गिरफ्तार किया है, जिसमें जमानत प्राप्त करना बहुत मुश्किल होता है। यह कानून 2002 में पारित हुआ था और 1 जुलाई 2005 को लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य मनी लॉन्ड्रिंग को रोकना है। 2012 में PMLA में संशोधन कर बैंकों, म्यूचुअल फंड्स, बीमा कंपनियों को भी इसके दायरे में लाया गया।

न्यायालय में बेगुनाही के सिद्धांत: आरोपी का संवेदनशील वक्तव्य

PMLA की धारा 45 में आरोपी की जमानत के लिए दो कठोर शर्तें होती हैं, जिसमें सभी अपराध गैर जमानती होते हैं। इसमें अग्रिम जमानत की प्रावधान नहीं है। ईडी को PMLA कानून के तहत बिना वारंट आरोपी के परिसर की तलाशी, गिरफ्तारी, संपत्ति की जब्ती और कुर्की का अधिकार प्राप्त है। इसके अंतर्गत अरेस्ट होने वाले को अदालत में आरोप के बेबुनियाद होने का साबित करना पड़ता है। जेल में रहते हुए आरोपी के लिए खुद को निर्दोष साबित कर पाना आसान नहीं होता। उदाहरण के रूप में, दिल्ली की AAP सरकार के पूर्व मंत्री मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन PMLA के तहत जेल में हैं। एक अन्य AAP नेता संजय सिंह भी PMLA में गिरफ्तार हुए थे और वर्तमान में जेल में हैं।

PMLA: जमानत मिलना मुश्किल, दो कठोर शर्तें लगाई गईं

2018 में सरकार ने PMLA में एक और संशोधन किया और इसकी धारा 45 में आरोपी की जमानत के लिए दो कठोर शर्तें जोड़ी थीं। इन शर्तों में एक यह थी कि जमानत याचिका के खिलाफ लोक अभियोजक को सुनने के लिए अदालत के पास उचित आधार होना चाहिए कि आरोपी अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहने के दौरान उसके द्वारा कोई अपराध करने की आशंका नहीं है। इस संशोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लगभग 100 याचिकाएं दायर हुई थीं, जिनमें PMLA एक्ट के तहत ईडी को गिरफ्तारी, संपत्ति जब्त करने के अधिकार और जमानत की दोहरी शर्तों पर सवाल उठाए गए थे।

PMLA की धारा 13, 19 और 24 को SC में दी गई चुनौती

अनुरोधों के अनुसार, पीएमएलए एक्ट को असंवैधानिक घोषित करके ईडी को सीआरपीसी के दायरे से बाहर कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 27 जुलाई 2022 को अपना निर्णय सुनाया, जिसमें ईडी के अधिकारों को बरकरार रखा गया। इसके साथ ही, उन्होंने पीएमएलए में 2018 के संशोधन को भी ठीक ठहराया। इस पीठ के अन्य जजों ने मनी लॉन्ड्रिंग को एक जघन्य अपराध कहा, जो राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है। इस पीठ के अन्य जजों में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार भी शामिल थे।

ईडी के अधिकारों पर SC का फैसला: जमानत की दो शर्तों को बरकरार रखा

शीर्ष अदालत ने पीएमएलए के अंतर्गत जमानत की दोहरी शर्तों पर विचार किया था, जिसमें कहा गया था, “हालांकि, दो शर्तें आरोपी के जमानत के अधिकार को सीमित करती हैं, लेकिन इस पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती हैं। यह प्रावधान, जैसा कि 2018 में संशोधन के बाद लागू है, उचित है और इसमें मनमानी या अनुचितता नहीं है। धन शोधन, यानी मनी लॉन्ड्रिंग, का मतलब है अवैध रूप से अर्जित आय या धन को छिपाना या वैध बनाना। अपराधी ऐसा इसलिए करते हैं, ताकि उनके द्वारा अवैध रूप से अर्जित धन, वैध स्रोतों से उत्पन्न प्रतीत हो।

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