अंधेरे में गुम होती सुरक्षा: करनाल स्ट्रीट लाइट समस्या से जनता परेशान
करनाल, हरियाणा का एक प्रमुख शहर जो ‘स्मार्ट सिटी’ की श्रेणी में शामिल किया गया है, वहां की एक प्रमुख समस्या ने प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। करनाल स्ट्रीट लाइट समस्या अब महज बिजली विभाग की तकनीकी कमी नहीं रही, बल्कि यह जनता की सुरक्षा और सुविधा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुकी है।
शहर का अत्यधिक व्यस्त मार्ग — पुराना बस स्टैंड से आंबेडकर चौक तक — रात के अंधेरे में गुम हो गया है। इस रूट पर लगी अधिकांश स्ट्रीट लाइटें या तो खराब हैं या फिर पूरी तरह बंद पड़ी हैं। कुछ स्थानों पर एक साइड की लाइट जल रही है, जबकि दूसरी साइड घुप अंधेरा रहता है। यह स्थिति न केवल दुर्घटनाओं को न्योता दे रही है, बल्कि महिला सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक है।
महिला थानों के आस-पास भी अंधेरा: स्मार्ट सिटी की चमक फीकी
जिन रास्तों पर महिला थाना, शहर थाना और सदर थाना जैसे संवेदनशील सुरक्षा संस्थान मौजूद हों, वहां अंधेरा पसरा हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। यह मार्ग केवल आम राहगीरों का नहीं, बल्कि प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
रात के समय जब महिलाएं इन क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं, तो अंधेरे में उनका डरना स्वाभाविक है। कोई भी आपातकालीन परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है — छेड़छाड़, चोरी या अन्य अपराध की संभावना।
हज़ारों की संख्या में गुजरते हैं लोग, अंधेरे से डर बना रहता है
यह मार्ग शहर को दो भागों से जोड़ता है — एक ओर एनडीआरआई व बाहरी कॉलोनियों से, और दूसरी ओर पुराने शहर से। इस रास्ते पर हर दिन हजारों वाहन चलते हैं। पैदल चलने वाले, स्कूली बच्चे, महिलाएं, वरिष्ठ नागरिक — हर कोई इस अंधेरे का शिकार बनता है।
हर शाम जैसे ही सूरज ढलता है, यह मार्ग मानो ‘डरावने गलियारे’ में तब्दील हो जाता है। ट्रैफिक की चहल-पहल तो होती है, पर रोशनी की कमी सभी को असहज बना देती है।
“स्मार्ट सिटी” का दावा हवा-हवाई?
करनाल को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं। डिजिटल डिस्प्ले, सीसीटीवी कैमरे, चौड़ी सड़कें और बायो टॉयलेट जैसी सुविधाएं दिखने में तो शानदार लगती हैं, लेकिन जब मूलभूत सुविधाएं जैसे स्ट्रीट लाइट ही काम न करें, तो स्मार्टनेस केवल कागजों में सिमट कर रह जाती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्ट्रीट लाइट की यह समस्या कोई नई नहीं है। महीनों से यह मुद्दा बना हुआ है। शिकायतें की गईं, फोटो भेजे गए, टोल फ्री नंबर पर कॉल किए गए, लेकिन नतीजा ‘शून्य’।
नगर निगम को दी कई शिकायतें, फिर भी नहीं मिला समाधान
अधिकांश दुकानदारों और स्थानीय निवासियों ने बताया कि उन्होंने नगर निगम को बार-बार शिकायत दी। लेकिन हर बार उन्हें यह कह कर टाल दिया गया कि जल्द ठीक करवा देंगे। “जल्द” का यह वादा महीनों से अधूरा है।
रमेश गुप्ता, जो इसी मार्ग पर एक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान चलाते हैं, कहते हैं —
“शाम होते ही दुकान के बाहर अंधेरा छा जाता है। ग्राहकों का आना जाना भी प्रभावित होता है। महिला ग्राहक तो इस सड़क पर रुकने से भी डरती हैं।”
आम जनता की चिंता, नेताओं की खामोशी
जहां एक तरफ आम जनता सुरक्षा को लेकर चिंतित है, वहीं स्थानीय पार्षदों और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। विकास के नाम पर वोट मांगने वाले नेता, अंधेरे में जनता को छोड़कर गायब हो जाते हैं।
कहीं न कहीं यह प्रशासनिक लापरवाही ही है कि एक इतना महत्वपूर्ण मार्ग लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहा है।
क्या केवल स्ट्रीट लाइट्स ठीक करना समाधान है?
यहां सवाल उठता है कि क्या केवल लाइट्स ठीक कर देने से समस्या हल हो जाएगी? नहीं। यह तो एक संकेत है कि हमारे शहरी प्रशासन में कितनी धीमी प्रतिक्रिया होती है।
जरूरत है एक स्थायी और प्रभावी तंत्र की — जिसमें सड़कों, लाइट्स और ट्रैफिक व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी हो। कोई भी नागरिक शिकायत करे, तो तय समय सीमा में उसका समाधान हो।
अंधेरे से कैसे बचें – नागरिकों की पहल की भी ज़रूरत
जहां एक ओर प्रशासन से जवाबदेही की मांग जरूरी है, वहीं नागरिकों को भी जागरूक होना होगा। मोहल्ला समितियां बनाकर स्थानीय निगरानी, सोशल मीडिया पर सक्रियता, और वार्ड स्तर पर नियमित रिपोर्टिंग — ये कदम सामूहिक प्रयास को जन्म दे सकते हैं।
क्या कहता है नगर निगम?
नगर निगम के एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया —
“सड़कों पर लाइटें कई बार ट्रिप हो जाती हैं या ट्रांसफार्मर फेल हो जाते हैं। मरम्मत टीम को भेजा जाता है, लेकिन कई बार कर्मचारियों की कमी भी बाधा बनती है।”
यह स्वीकारोक्ति इस बात की ओर इशारा करती है कि करनाल नगर निगम को तकनीकी और मानवीय संसाधनों की भी जरूरत है।
प्रशासन को चेतावनी, जनता को सुरक्षा चाहिए
समस्या गंभीर है और नजरअंदाज करने लायक नहीं। यदि यह स्थिति बनी रही, तो किसी दिन कोई बड़ी दुर्घटना या अपराधिक घटना हो सकती है। और तब प्रशासन पर उंगली उठाने का कोई फायदा नहीं होगा।
जनता की सुरक्षा, शासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। स्ट्रीट लाइटों का दुरुस्त होना न केवल बुनियादी सुविधा है, बल्कि यह शहर के आधुनिक और सुरक्षित होने की पहचान भी है।
निष्कर्ष: समाधान की दिशा में तत्काल कदम जरूरी
इस समस्या का समाधान जल्द निकालना प्रशासन की साख से जुड़ा विषय है। यदि स्मार्ट सिटी में अंधेरा पसरा रहेगा, तो विकास का दावा केवल जुमला ही बनकर रह जाएगा।
हमें उम्मीद है कि प्रशासन अब नींद से जागेगा और जल्द ही यह महत्वपूर्ण मार्ग फिर से रोशनी से जगमगाएगा।
