लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह (वीर चक्र) पर विशेष: एक बहादुर सैनिक, एक समर्पित शिक्षक और एक प्रेरक कुलपति जिनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी।

WhatsApp Image 2025 11 07 at 9.11.05 PM
Spread the love

लेखक: संजय कुमार शर्मा, संपादक, 9pm News Channel, घरौंडा।

लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह वीर चक्र — यह नाम न सिर्फ एक सम्मानित सैनिक का है, बल्कि एक ऐसी शख्सियत का प्रतीक है जिसने अपने जीवन को मातृभूमि की सेवा और समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। आज जब हम उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तब उनके जीवन की कहानी हर भारतीय के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

एक साधारण गांव से असाधारण यात्रा तक

लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह वीर चक्र
लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह वीर चक्र

सोनीपत जिले के मोहना गांव में 2 अक्टूबर 1933 को एक संयुक्त किसान परिवार में जन्मे सुनहरा सिंह अपने भाइयों में सबसे छोटे थे। बचपन से ही उनमें असाधारण ऊर्जा और नेतृत्व की झलक दिखती थी। शिक्षा के क्षेत्र में वे हमेशा अव्वल रहे — चाहे स्कूल हो या कॉलेज, हर जगह उन्होंने अपनी मेहनत से पहचान बनाई।

1953 में उन्होंने भारतीय सेना की 7th Cavalry ज्वाइन की। बाद में अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी, चेन्नई से स्वर्ण पदक (Gold Medal) के साथ पासआउट होकर 15 कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त किया। यहीं से शुरू हुई एक ऐसे सैनिक की यात्रा जिसने तीन युद्धों में अपने साहस से भारत का नाम रोशन किया।

तीन युद्धों में वीरता का परिचय

लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह ने अपने शानदार सैन्य करियर के दौरान तीन बड़े युद्धों में हिस्सा लिया —

  • 1962 का चीन युद्ध (तवांग मोर्चा)
  • 1965 का भारत-पाक युद्ध (माला सेक्टर)
  • 1971 का भारत-पाक युद्ध (गादरा सिटी)

तीनों ही युद्धों में उनके नेतृत्व और साहस ने सैनिकों में जोश भर दिया। 1971 के युद्ध में उनके अनुकरणीय नेतृत्व और वीरता के लिए भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें “वीर चक्र” से सम्मानित किया। यह सम्मान न केवल उनके लिए बल्कि पूरे हरियाणा के लिए गौरव का क्षण था।

सैनिक से समाजसेवी तक की प्रेरक यात्रा

लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह
लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह

सैन्य सेवा के लगभग चार दशक पूरे करने के बाद 1988 में उन्होंने सेवानिवृत्ति ली। लेकिन देशसेवा की भावना उनके भीतर तब भी जीवित थी।
रिटायरमेंट के बाद उन्होंने सोचा — “अगर मैं हजारों सैनिकों को प्रशिक्षण दे सकता हूँ, तो क्यों न आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रप्रेम सिखाऊं?”

इसी सोच से उन्होंने करनाल में राइजिंग सन पब्लिक स्कूल की स्थापना की। 23 वर्षों तक उन्होंने इस विद्यालय का नेतृत्व किया और सैकड़ों विद्यार्थियों को न केवल शिक्षा दी, बल्कि उनमें देशभक्ति और अनुशासन की भावना भी जगाई।

उनके मार्गदर्शन में कई छात्र राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में पहुंचे — यह अपने आप में एक अमूल्य योगदान था।

एक प्रेरक कुलपति की दृष्टि

80 वर्ष की आयु में भी जब लोग विश्राम की सोचते हैं, तब लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह ने अपने जीवन का एक और स्वप्न साकार किया —
उन्होंने वार हीरोज़ मेमोरियल स्कूल, घरौंडा (बस्ताड़ा, जी.टी. रोड) की स्थापना की।
यह संस्थान भारत के उन सैनिकों को समर्पित है जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

उन्होंने कहा था —

“मेरी जिंदगी का मकसद सिर्फ सेना या शिक्षा नहीं, बल्कि उन दोनों का संगम है — ताकि देश के लिए सोचने वाली पीढ़ी तैयार हो।”

कृषक पुत्र से कर्मयोगी तक

एक किसान परिवार से आने वाले सुनहरा सिंह ने दिखाया कि अगर संकल्प मजबूत हो तो सीमाएँ मायने नहीं रखतीं।
उन्होंने हजारों युवाओं को सिखाया कि “देशभक्ति सिर्फ यूनिफॉर्म पहनने से नहीं, कर्म से साबित होती है।”

1978 से 1981 के बीच उन्होंने जम्मू क्षेत्र में 20,000 सैनिकों की भर्ती करवाई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था।
उनकी यह सेवा सेना और समाज, दोनों के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक रही।

मानवता, विनम्रता और अनुशासन का संगम

लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह न केवल एक अनुशासित सैनिक थे, बल्कि बेहद विनम्र और संवेदनशील इंसान भी थे।
वे हमेशा कहते थे —

“जो इंसान अपने कर्म में ईमानदार है, वही सच्चा देशभक्त है।”

उनके विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थी आज भी उन्हें “सर नहीं, प्रेरणा” कहकर याद करते हैं।

अंतिम विदाई और अमर विरासत

31 अक्टूबर 2025 को जब उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
9 नवंबर 2025 को उनके सम्मान में War Heroes Memorial School, Gharaunda में “प्रार्थना सभा” आयोजित की गई —
जहाँ परिजनों, सैनिकों, शिक्षकों और छात्रों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

उनकी मुस्कुराहट, उनकी वाणी और उनका अनुशासन आज भी उन संस्थानों की दीवारों में गूंजता है जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से बनाया।

संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए

लेफ्टिनेंट कर्नल सुनहरा सिंह वीर चक्र की विरासत केवल सम्मान के तमगों में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में है जो उन्होंने अपने जीवन से सिखाए —

  • शिक्षा से समाज का उत्थान
  • अनुशासन से आत्मबल
  • और देशभक्ति से पहचान

उनकी यात्रा हमें याद दिलाती है कि एक व्यक्ति भी इतिहास बदल सकता है अगर उसके इरादे राष्ट्र के लिए हों।

भारत माता की जय, जय हिंद।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *