सड़क पर रहने वाले बच्चों का पुनर्वास: करनाल प्रशासन का बड़ा अभियान, 64 की जगह पहुंचे 74 बच्चे

सड़क पर रहने वाले बच्चों का पुनर्वास: करनाल प्रशासन का बड़ा अभियान, 64 की जगह पहुंचे 74 बच्चे
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करनाल में प्रशासन की अनोखी पहल… सड़क, भिक्षावृत्ति और स्लम जीवन से बाहर निकलकर अब स्कूल और आंगनबाड़ी पहुंचेंगे बच्चे। शिविर में उम्मीद से ज्यादा पहुंचे बच्चे, कई का इलाज, आधार कार्ड और स्कूल दाखिले की प्रक्रिया शुरू।

सड़क पर रहने वाले बच्चों का पुनर्वास: करनाल प्रशासन की पहल बनी उम्मीद की नई किरण

करनाल। सड़क पर रहने वाले बच्चों का पुनर्वास करने के उद्देश्य से करनाल प्रशासन ने बुधवार को ऐसा कदम उठाया, जिसने न केवल कई बच्चों के जीवन को नई दिशा देने का प्रयास किया बल्कि समाज के सामने संवेदनशील प्रशासन की मिसाल भी पेश की। सेक्टर-16 स्थित राजकीय पॉलीक्लिनिक में महिला एवं बाल विकास विभाग और जिला बाल संरक्षण यूनिट की ओर से विशेष शिविर लगाया गया, जहां स्लम एरिया और सड़क पर रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पहचान और पुनर्वास से जुड़ी सेवाएं एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराई गईं।

इस शिविर में चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की ओर से 64 बच्चों को चिन्हित किया गया था, लेकिन प्रशासन की उम्मीदों से आगे बढ़ते हुए 74 बच्चे शिविर में पहुंचे। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि समाज के अंतिम छोर पर खड़े परिवार भी अब सरकारी योजनाओं और मदद की ओर भरोसे से देख रहे हैं।

सड़क से स्कूल तक पहुंचाने की तैयारी

शिविर का मुख्य उद्देश्य ऐसे बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना था जो भिक्षावृत्ति, बालश्रम, बेसहारा स्थिति या मलिन बस्तियों में रहकर जीवन गुजार रहे हैं। प्रशासन की योजना केवल अस्थायी सहायता तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और पहचान से जोड़कर स्थायी पुनर्वास का प्रयास किया गया।

जांच के दौरान शून्य से छह वर्ष तक के 10 बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों में दाखिले योग्य पाया गया, जबकि 6 से 15 वर्ष तक के 19 बच्चों को स्कूल में प्रवेश के योग्य माना गया। संबंधित विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि इन बच्चों का जल्द से जल्द स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में दाखिला सुनिश्चित किया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सड़क पर रहने वाले बच्चों को समय रहते शिक्षा और पोषण से जोड़ा जाए तो उनका भविष्य पूरी तरह बदल सकता है। यही कारण है कि यह शिविर केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है।

स्वास्थ्य जांच में सामने आई कई जरूरतें

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य योजना के तहत स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों ने बच्चों की व्यापक स्वास्थ्य जांच की। इसमें रक्तचाप, वजन, ऊंचाई, सिर और बाजू का माप लिया गया। साथ ही जन्मजात बीमारियों जैसे दिल में छेद और अन्य गंभीर विकारों की भी जांच की गई।

बच्चों का टीकाकरण भी किया गया ताकि उन्हें गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सके। कई बच्चों में पोषण की कमी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी सामने आईं, जिनके लिए आगे की चिकित्सा प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए।

शिविर में 18 बच्चों का एचआईवी टेस्ट भी किया गया। प्रशासन का मानना है कि सड़क पर रहने वाले बच्चों को समय-समय पर स्वास्थ्य जांच से जोड़ना बेहद जरूरी है क्योंकि ऐसे बच्चे अक्सर चिकित्सा सुविधाओं से दूर रहते हैं।

मौके पर बने आधार कार्ड, पहचान मिलने की खुशी

सड़क और स्लम में रहने वाले अधिकांश बच्चों के पास पहचान से जुड़े जरूरी दस्तावेज नहीं होते, जिसके कारण वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते। इस समस्या को देखते हुए नागरिक संसाधन सूचना विभाग (क्रीड) की ओर से शिविर में ही आधार कार्ड बनाने का विशेष काउंटर लगाया गया।

यहां 15 बच्चों के मौके पर ही आधार कार्ड बनाए गए। अधिकारियों का कहना है कि दस्तावेज बनने के बाद ये बच्चे सरकार की विभिन्न योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों से सीधे जुड़ सकेंगे।

लड़कियों को HPV वैक्सीन के प्रति जागरूक किया

शिविर में केवल बच्चों पर ही नहीं, बल्कि किशोरियों के स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान दिया गया। 14-15 साल की युवतियों को एचपीवी वैक्सीन के प्रति जागरूक किया गया।

डॉक्टरों ने बताया कि यह वैक्सीन महिलाओं को भविष्य में गंभीर बीमारियों से बचाने में मदद करती है। स्लम क्षेत्रों में जागरूकता की कमी के कारण अक्सर किशोरियां ऐसी जरूरी स्वास्थ्य जानकारी से वंचित रह जाती हैं।

रेडक्रास ने बांटा अल्पाहार

जिला रेडक्रास सोसायटी की ओर से शिविर में पहुंचे बच्चों को अल्पाहार वितरित किया गया। कई बच्चों के चेहरे पर पहली बार ऐसा अनुभव दिखा जब उन्हें सम्मान के साथ बैठाकर भोजन और स्वास्थ्य सेवाएं दी गईं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे छोटे कदम बच्चों में विश्वास पैदा करते हैं और उन्हें समाज से जुड़ने का एहसास कराते हैं।

उपायुक्त डॉ. आनंद कुमार शर्मा ने लिया शिविर का जायजा

करनाल के उपायुक्त डॉ. आनंद कुमार शर्मा स्वयं शिविर में पहुंचे और विभिन्न विभागों के काउंटरों का निरीक्षण किया। उन्होंने डॉक्टरों, आशा वर्कर्स और कर्मचारियों से बच्चों के स्वास्थ्य और दस्तावेजों की स्थिति की जानकारी ली।

उपायुक्त ने स्पष्ट निर्देश दिए कि शिविर में आने वाला कोई भी बच्चा अधूरी प्रक्रिया के साथ वापस नहीं लौटना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर बच्चे की गहनता से जांच हो और उसे संबंधित सेवाओं से जोड़ा जाए।

उन्होंने कहा कि सड़क पर रहने वाले बच्चों को मुख्यधारा में लाना केवल प्रशासनिक कार्य नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। प्रशासन का उद्देश्य इन बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य देना है।

करनाल में 350 बच्चों की पहचान

प्रशासन के अनुसार करनाल शहर में ऐसे करीब 350 बच्चों की पहचान की गई है जो सड़क, स्लम या असुरक्षित परिस्थितियों में रह रहे हैं।

इन बच्चों के लिए चरणबद्ध तरीके से अलग-अलग क्षेत्रों में शिविर लगाए जाएंगे ताकि हर बच्चे तक पहुंच बनाई जा सके। प्रशासन का मानना है कि यदि समाज और विभाग मिलकर काम करें तो इन बच्चों का भविष्य बदला जा सकता है।

महिलाओं की स्वास्थ्य जांच भी होगी

उपायुक्त ने निर्देश दिए कि शिविर में बच्चों के साथ आने वाली महिलाओं की भी स्वास्थ्य जांच की जाए। इसके साथ ही महिला एवं बाल विकास विभाग को बच्चों और माता-पिता की काउंसलिंग के लिए अलग और सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने को कहा गया।

उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि आने वाले शिविरों में नगर निगम की ओर से जन्म प्रमाण पत्र बनाने का काउंटर भी लगाया जाए ताकि बच्चों की पहचान प्रक्रिया और आसान हो सके।

अगले चार दिन कहां लगेंगे शिविर?

प्रशासन ने अगले चार दिनों के लिए भी विशेष शिविरों का कार्यक्रम जारी किया है।

आगामी शिविर:

  • 14 मई – नमस्ते चौक के पास शनि मंदिर
  • 18 मई – सेक्टर 12, पेट्रोल पंप के पास पाठक अस्पताल के सामने
  • 20 और 21 मई – सेक्टर 33, न्यू कम्युनिटी सेंटर

इन शिविरों में भी स्वास्थ्य जांच, आधार कार्ड, शिक्षा और पुनर्वास से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध रहेंगी।

कई विभागों ने मिलकर निभाई जिम्मेदारी

इस अभियान में महिला एवं बाल विकास विभाग, जिला बाल संरक्षण यूनिट, स्वास्थ्य विभाग, श्रम विभाग, रेडक्रास सोसायटी, क्रीड, शिक्षा विभाग और अन्य संस्थाओं ने मिलकर काम किया।

शिविर में सहायक आयुक्त (प्रशिक्षणाधीन) सोहम शैलेंद्र, एसएमओ नीरू बाला, डॉ. नवजीत सिंह, संरक्षण अधिकारी सुमन, काउंसलर डॉ. पूनम शर्मा, सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष चंद्र प्रकाश, सदस्य सुमन और सुषमा, क्रीड से पिंकी देशवाल, प्रदीप, मनजीत, राहुल और सोशल वर्कर प्रदीप शर्मा मौजूद रहे।

समाज के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अभियान?

यह अभियान केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह उन बच्चों के भविष्य से जुड़ा है जो अक्सर ट्रैफिक सिग्नल, सड़क किनारे या स्लम में जिंदगी बिताते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • सड़क पर रहने वाले बच्चे अपराध और शोषण के सबसे बड़े खतरे में होते हैं।
  • शिक्षा और पहचान मिलने से उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
  • शुरुआती स्वास्थ्य जांच कई गंभीर बीमारियों को रोक सकती है।
  • ऐसे शिविर समाज में समानता और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करते हैं।

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