हरियाणा रोडवेज कर्मचारी न्याय मार्च: निजीकरण के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे कर्मचारी, परिवहन मंत्री के आवास पर घेराव की चेतावनी

हरियाणा रोडवेज कर्मचारी न्याय मार्च: निजीकरण के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे कर्मचारी, परिवहन मंत्री के आवास पर घेराव की चेतावनी
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हरियाणा रोडवेज सरकारी बसें अगर सड़कों से गायब हुईं, तो सबसे पहले चोट आम आदमी, छात्र और गरीब वर्ग को लगेगी—इसी चेतावनी के साथ हरियाणा रोडवेज कर्मचारी अब निर्णायक संघर्ष की तैयारी में हैं।

करनाल।
हरियाणा रोडवेज कर्मचारी न्याय मार्च को लेकर प्रदेशभर में हलचल तेज हो गई है। लंबित मांगों, रोडवेज के बढ़ते निजीकरण और सरकारी बसों की कमी को लेकर हरियाणा रोडवेज कर्मचारी सांझा मोर्चा ने सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। मंगलवार को करनाल रोडवेज डिपो में आयोजित अहम बैठक में सभी यूनियन प्रधानों ने एक स्वर में चेतावनी दी कि यदि सरकार ने कर्मचारियों और जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता नहीं दिखाई, तो 18 जनवरी को अंबाला छावनी स्थित परिवहन मंत्री के आवास पर विशाल न्याय मार्च निकाला जाएगा।

बैठक का संचालन कृपाल लाड़ी ने किया, जबकि साझा मोर्चे के वरिष्ठ सदस्य जयबीर घनघस, जगदीप लाठर, वीरेंद्र सिंगरोह, अशोक खोखर और संजीव कुमार ने विस्तार से मौजूदा हालात पर चर्चा की। नेताओं ने कहा कि सरकार की नीतियां धीरे-धीरे हरियाणा रोडवेज को कमजोर कर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की दिशा में बढ़ रही हैं।

निजीकरण बनाम जनसेवा: सबसे बड़ा सवाल

बैठक में वक्ताओं ने साफ कहा कि प्रदेश सरकार छात्र-छात्राओं, महिलाओं, बुजुर्गों और आम नागरिकों की सुरक्षित व सस्ती परिवहन सेवा को निजी हाथों में सौंप रही है। निजी बसों के संचालन से न केवल किराया बढ़ेगा, बल्कि सुरक्षा और जवाबदेही भी प्रभावित होगी।

वरिष्ठ नेता जयबीर घनघस ने कहा—

“रोडवेज केवल परिवहन सेवा नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। निजी कंपनियों का मकसद मुनाफा होता है, जबकि रोडवेज का उद्देश्य सेवा है।”

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों, सीमावर्ती गांवों और कम यात्री वाले रूटों पर निजी बसें नहीं चलतीं, लेकिन रोडवेज आज भी वहां सेवा दे रही है।

छात्रों और महिलाओं पर सीधा असर

संयुक्त मोर्चे ने कहा कि रोडवेज के कमजोर होने से सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों और महिलाओं को होगा। आज हरियाणा रोडवेज छात्र पास, महिला रियायत और बुजुर्गों को सस्ती यात्रा की सुविधा देता है, जो निजी बसों में लगभग नामुमकिन है।

जगदीप लाठर ने कहा—

“अगर रोडवेज नहीं बची, तो छात्र पढ़ाई छोड़ने को मजबूर होंगे और महिलाओं की सुरक्षित यात्रा खतरे में पड़ जाएगी।”

बसों की कमी: सरकार की बड़ी चूक

नेताओं ने बताया कि प्रदेश की जनसंख्या के हिसाब से रोडवेज के बेड़े में हजारों बसों की कमी है। कई डिपो ऐसे हैं, जहां जरूरत के आधे से भी कम बसें चल रही हैं।

वीरेंद्र सिंगरोह ने मांग रखी कि—

  • सरकार तुरंत नई सरकारी बसें खरीदे
  • सभी खाली पदों पर भर्ती की जाए
  • संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जाए

उन्होंने कहा कि इससे न केवल परिवहन व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि हजारों बेरोजगार युवाओं को रोजगार भी मिलेगा।

रोजगार का सवाल: युवा क्यों नाराज़ हैं

हरियाणा रोडवेज लंबे समय से प्रदेश के युवाओं को रोजगार देता रहा है—ड्राइवर, कंडक्टर, तकनीकी स्टाफ और वर्कशॉप कर्मी। लेकिन नई भर्तियों पर रोक और निजीकरण के चलते रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं।

अशोक खोखर ने कहा—

“सरकार रोजगार की बात करती है, लेकिन रोडवेज जैसे बड़े विभाग को कमजोर कर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है।”

न्याय मार्च क्यों जरूरी बताया जा रहा है

साझा मोर्चे का कहना है कि कई बार ज्ञापन, बैठक और बातचीत के बावजूद सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अब कर्मचारियों के पास सड़क पर उतरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

संजीव कुमार ने साफ कहा—

“यह लड़ाई केवल कर्मचारियों की नहीं, बल्कि आम जनता की है। अगर आज चुप रहे, तो कल सस्ती बस सेवा इतिहास बन जाएगी।”

18 जनवरी: निर्णायक दिन

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो 18 जनवरी को अंबाला छावनी में परिवहन मंत्री के आवास पर शांतिपूर्ण लेकिन विशाल हरियाणा रोडवेज कर्मचारी न्याय मार्च निकाला जाएगा।

इस मार्च में—

  • प्रदेशभर से रोडवेज कर्मचारी
  • विभिन्न यूनियन
  • जनसमर्थन

शामिल होंगे।

सरकार से क्या मांगें रखी गईं

साझा मोर्चे की प्रमुख मांगें—

  1. रोडवेज का निजीकरण तुरंत रोका जाए
  2. नई सरकारी बसों की खरीद की जाए
  3. खाली पदों पर स्थायी भर्ती हो
  4. संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जाए
  5. कर्मचारियों की लंबित मांगें शीघ्र हल हों

निष्कर्ष (Editorial Tone)

हरियाणा रोडवेज केवल एक विभाग नहीं, बल्कि करोड़ों यात्रियों की जीवनरेखा है। अगर इसे निजी मुनाफे के हवाले कर दिया गया, तो सामाजिक न्याय, रोजगार और सुरक्षित परिवहन—तीनों पर गहरा संकट खड़ा हो जाएगा। अब देखना यह है कि सरकार संवाद का रास्ता चुनती है या 18 जनवरी को सड़क पर उठती आवाजों का सामना करती है।

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