करनाल की अदालतों में एक-एक केस सालों से फाइलों में अटका है… फैसले दूर, तारीखें ही तारीखें। आखिर क्यों न्याय का इंतज़ार इतना लंबा है?
अदालतों में लंबित मामले: फैसलों से अधिक मिल रही तारीख… न्याय का इंतज़ार कितना लंबा?
घरौंडा/करनाल।
करनाल की अदालतों में अदालतों में लंबित मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। यह सिर्फ आँकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन हज़ारों लोगों का दर्द है जो हर पेशी पर कोर्ट की दहलीज पर यह उम्मीद लेकर पहुंचते हैं कि शायद आज फैसला आएगा, शायद आज न्याय मिलेगा। लेकिन हकीकत उलट है—फैसलों से अधिक तारीखें, सुनवाई से अधिक इंतज़ार, और न्याय से अधिक निराशा मिल रही है।
कानूनी विशेषज्ञों और अधिवक्ताओं का मानना है कि यह स्थिति सिर्फ करनाल नहीं, पूरे देश की अदालतों की एक गंभीर समस्या बन चुकी है। मगर करनाल के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि यहाँ का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और पिछले दो वर्षों में लंबित मामलों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज हुई है।
80,774 केस लंबित—सबसे ज्यादा भार आपराधिक मामलों का
करनाल जिला न्यायालय के आधिकारिक आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
- कुल लंबित मामले – 80,774
- अपराधिक मामले – 55,837
- सिविल मामले – 24,937
सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें से ज्यादातर केस एक से तीन साल पुराने हैं, जो यह दर्शाता है कि प्राथमिक स्तर पर ही केसों का तेजी से निपटारा नहीं हो पा रहा।
फास्टट्रैक कोर्ट ने बचाया बढ़ता बोझ—फिर भी हालात गंभीर
साल 2019 में फास्टट्रैक अदालतों की स्थापना ने कई मामलों में राहत दी। यदि ये अदालतें नहीं होतीं तो वर्तमान लंबित मामलों का आंकड़ा 1 लाख के पार पहुंच चुका होता। फिर भी, लाख कोशिशों के बावजूद 1,032 केस सिर्फ इसलिए लंबित हैं क्योंकि सरकारी गवाह पेश नहीं होते।
610 केस ऐसे हैं जिनमें वकील ही मौजूद नहीं।
28 केसों में वादी और प्रतिवादी दोनों रुचि नहीं दिखा रहे।
73 मामलों में गवाहों की संख्या अधिक होने के कारण प्रक्रिया धीमी है।
सबसे बड़ी समस्या: गवाहों की गैरहाजिरी
अदालत में हर तारीख पर सबसे ज्यादा चर्चित कारण यह होता है—“गवाह पेश नहीं हुए।”
ड्यूटी, तबादला, व्यस्तता या व्यक्तिगत कारण… सरकारी गवाहों की अनुपस्थिति अदालतों की सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है।
जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरजीत मढ़ान ने कहा—
“जब सरकारी गवाह, खासकर पुलिस अधिकारी अदालत नहीं पहुंचते, केस रुक जाते हैं। कई मामलों में 4–5 आरोपी होते हैं, यदि एक भी आरोपी पेश न हो पाए तो अदालत केस को अलग कर ‘भगौड़ा’ घोषित करने की प्रक्रिया अपनाती है, जो और समय खा जाती है।”
नवंबर में आए 4,052 नए केस—हर महीने बढ़ता दबाव
सिर्फ नवंबर महीने में ही:
- 4,052 नए मामले दर्ज हुए
- इनमें से 812 सिविल, 3,240 आपराधिक
- इसी अवधि में 4,103 मामलों का निपटारा भी हुआ
लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि जितने केस निपटाए गए लगभग उतने ही नए दाखिल हो गए, यानी कुल बोझ कम होने की बजाय स्थिर बना हुआ है।
बीते एक साल में 41,041 नए केस दाखिल—चौंकाने वाला रुझान
पिछले 12 महीनों में:
- 12,519 सिविल मामले
- 28,552 आपराधिक मामले
इस तरह हर महीने औसतन 3,400 केस अदालतों में दाखिल हो रहे हैं, जो मौजूदा सिस्टम पर भारी दबाव डालने के लिए काफी हैं।
10 साल से अधिक पुराने 105 केस—कब मिलेगा न्याय?
सबसे दुखद स्थिति उन परिवारों की है जो एक दशक से अधिक समय से न्याय की प्रतीक्षा में हैं।
- 55 सिविल मामले
- 50 आपराधिक मामले
इनमें से अधिकांश मामलों में या तो गवाह पेश नहीं हुए, या बार-बार स्थगन के चलते केस लंबा खिंचता चला गया।
वर्ष 2021 का सड़क हादसा अब भी लंबित—क्यों?
असंध का चर्चित केस एक उदाहरण है कि क्यों न्याय में देरी होती है।
12 सितंबर 2021 – असंध बाईपास पर सड़क हादसे में बस चालक पर आइपीसी धारा 279, 337 के तहत मामला दर्ज हुआ।
30 मई 2022 से केस गवाही चरण में है, लेकिन शिकायतकर्ता पक्ष गवाही देने नहीं आ रहा, जबकि आरोपी सुरेंद्र हर तारीख पर मौजूद रहता है।
यह पूरा मामला दिखाता है कि सिर्फ अदालतें ही जिम्मेदार नहीं, बल्कि वादी-प्रतिवादी, वकील, गवाह—सबकी सहभागिता आवश्यक है, अन्यथा न्याय का पहिया रुक जाता है।
निष्कर्ष
न्याय में देरी, न्याय के इंकार के बराबर है।
करनाल की अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या यह स्पष्ट करती है कि सिस्टम में बड़े सुधारों की जरूरत है।
जब तक सभी पक्ष—अदालत, वकील, गवाह, पुलिस—अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं निभाते, तब तक लोगों को तारीख़ों के भंवर में फंसकर न्याय का इंतज़ार करना ही होगा।
