आंगनबाड़ी केंद्र बदहाल: छत से टपकता पानी, बंद शौचालय और जान जोखिम में डालकर पढ़ते मासूम

आंगनबाड़ी केंद्र बदहाल: छत से टपकता पानी, बंद शौचालय और जान जोखिम में डालकर पढ़ते मासूम
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आंगनबाड़ी केंद्र बदहाल जब बारिश होती है तो छत से पानी टपकता है, फर्श दलदल बन जाता है, शौचालय सालों से बंद हैं और उसी कमरे में बच्चों को पढ़ाया भी जाता है, खाना भी पकता है — सवाल यह है कि क्या यही है सरकार का ‘सशक्त आंगनबाड़ी’ मॉडल?

करनाल।
सरकार एक ओर पोषण अभियान, बाल विकास और महिला सशक्तिकरण को प्राथमिकता बताते हुए आंगनबाड़ी केंद्रों को मजबूत करने के दावे कर रही है, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखा रही है। निसिंग क्षेत्र के बरास रोड स्थित आंगनबाड़ी केंद्र बदहाल हालत में वर्षों से संचालित हो रहा है, जहां न तो बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित है और न ही शिक्षा व पोषण का अनुकूल वातावरण।

यह केंद्र न सिर्फ प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन चुका है, बल्कि उन मासूम बच्चों और गर्भवती महिलाओं की सेहत के लिए भी खतरा है, जिनके उज्ज्वल भविष्य की जिम्मेदारी इसी व्यवस्था के कंधों पर है।

आंगनबाड़ी केंद्र बदहाल जर्जर भवन, टूटा फर्श और टपकती छत

केंद्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रानी बताती हैं कि भवन की हालत पिछले कई वर्षों से बेहद खराब है।

“पिछले करीब पांच साल से फर्श टूटा हुआ है। बरसात में छत से पानी टपकता है। कई बार पूरा कमरा पानी से भर जाता है।”

बारिश के दिनों में स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि बच्चों को बैठाना तो दूर, उन्हें केंद्र में रोक पाना भी मुश्किल हो जाता है। कई बार मजबूरी में पढ़ाई पूरी तरह से बंद करनी पड़ती है।

शौचालय हैं लेकिन इस्तेमाल के लायक नहीं

केंद्र में शौचालय तो बने हैं, लेकिन वे कई वर्षों से बंद पड़े हैं
सीवरेज की व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है, जिससे बदबू और गंदगी का माहौल बना रहता है।

छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा का न होना, स्वास्थ्य मानकों का खुला उल्लंघन है।

मेन गेट नहीं, जानवर और शराबी आसानी से घुस जाते हैं

केंद्र में आज तक मेन गेट तक नहीं लगाया गया
इसका नतीजा यह है कि:

  • आवारा जानवर अंदर घुस जाते हैं
  • रात के समय शराब पीने वाले असामाजिक तत्व यहां बैठते हैं
  • केंद्र के सामान चोरी होने का खतरा बना रहता है

यह स्थिति बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

20–25 मासूम बच्चे रोज आते हैं पढ़ने

इस बदहाल व्यवस्था के बावजूद रोजाना 20 से 25 छोटे बच्चे इस आंगनबाड़ी केंद्र में पढ़ने आते हैं।
माता-पिता मजबूरी में बच्चों को यहां भेजते हैं, क्योंकि आसपास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी जगह बच्चों को भेजना सुरक्षित है?

एक ही कमरे में पढ़ाई और खाना पकाने की मजबूरी

केंद्र की कार्यकर्ता रानी बताती हैं कि यहां अलग से रसोई की कोई व्यवस्था नहीं है।

  • एक ही कमरे में पढ़ाई होती है
  • उसी कमरे में खाना पकाया जाता है
  • वहीं भोजन वितरण भी किया जाता है

धुआं, गर्म बर्तन, सीमित जगह और बच्चों की चहल-पहल — यह सब मिलकर किसी भी समय बड़े हादसे को न्योता दे सकते हैं।

सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों पर खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • नमी और सीलन से बच्चों में संक्रमण फैलने का खतरा
  • गंदे फर्श से फिसलने और चोट लगने की आशंका
  • खुले सीवरेज से बीमारियां फैलने का डर
  • धुएं से बच्चों के फेफड़ों पर असर

यह सब बाल अधिकारों और स्वास्थ्य सुरक्षा नियमों का सीधा उल्लंघन है।

सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई का फर्क

सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि:

  • आंगनबाड़ी केंद्रों को स्मार्ट बनाया जा रहा है
  • बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है
  • बच्चों को सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण दिया जा रहा है

लेकिन निसिंग का यह केंद्र इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।

प्रशासन का पक्ष (वर्जन)

इस पूरे मामले पर सीडीपीओ ब्लॉक निसिंग, सुदेश का कहना है:

“पिछले कई महीनों से जिला परिषद को मरम्मत के लिए बजट की मांग भेजी गई है। जैसे ही सरकार की ओर से बजट आएगा, जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों और प्ले स्कूलों की मरम्मत कराई जाएगी। उम्मीद है कि इस माह के अंत तक बजट आ जाएगा और काम शुरू होगा।”

हालांकि सवाल यह है कि जब तक बजट आएगा, तब तक बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?

बड़े सवाल जो जवाब मांगते हैं

  1. पांच साल से मरम्मत क्यों नहीं हुई?
  2. शौचालय आज तक चालू क्यों नहीं हुए?
  3. बिना गेट के केंद्र कैसे संचालित हो रहा है?
  4. क्या बच्चों की जान से ज्यादा अहम फाइलों की मंजूरी है?

निष्कर्ष (संपादकीय दृष्टि से)

आंगनबाड़ी केंद्र सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं होते, बल्कि यही वह जगह है जहां देश का भविष्य आकार लेता है।
अगर आंगनबाड़ी केंद्र बदहाल रहेंगे, तो सरकार के तमाम विकास दावे खोखले साबित होंगे।

अब जरूरत है कि आश्वासनों से आगे बढ़कर तत्काल कार्रवाई की जाए, ताकि मासूम बच्चों को सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक वातावरण मिल सके।

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