करनाल नगर निगम चुनाव: 13 वार्डों में परिवारवाद की गूंज, 20 में से 13 वार्डों में एक ही परिवार के प्रत्याशी

करनाल नगर निगम चुनाव: 13 वार्डों में परिवारवाद की गूंज, 20 में से 13 वार्डों में एक ही परिवार के प्रत्याशी
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करनाल। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा चर्चा का केंद्र रहता है, लेकिन इस बार करनाल नगर निगम चुनावों में भी इसकी स्पष्ट झलक देखने को मिल रही है। कई वार्डों में सियासी परिवार अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने परिजनों को मैदान में उतार रहे हैं। कोई वार्डबंदी के कारण अपनी राजनीतिक विरासत को बरकरार रखने के लिए प्रयासरत है, तो किसी ने पूर्व पार्षद के दिवंगत होने के बाद अपने परिवार की पहचान बनाए रखने के लिए चुनावी समर में कदम रखा है।

13 वार्डों में परिवारवाद का वर्चस्व

करनाल नगर निगम के 20 में से 13 वार्डों में पार्षद पद के लिए परिवारवाद हावी नजर आ रहा है। इनमें से सात वार्डों में भाजपा ने पूर्व पार्षदों के परिजनों को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने भी अपने नेताओं के परिवारों को अवसर दिया है। इसके अलावा, आठ ऐसे वार्ड हैं जहां पूर्व पार्षद टिकट न मिलने पर या तो खुद निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं या फिर अपने किसी परिजन को चुनावी रण में उतार चुके हैं।

भाजपा-कांग्रेस निर्दलीयों को साधने में जुटी

भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही प्रमुख दल निर्दलीय प्रत्याशियों को अपने पाले में लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। भाजपा ने वार्ड-08 और वार्ड-11 में निर्दलीयों को समर्थन देकर अपने प्रत्याशियों को निर्विरोध जीत दिलवा दी है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने भी पांच निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन दिया है, जहां पार्टी ने किसी को टिकट नहीं दिया था।

वार्ड-वार्ड देखिए कहां-कहां परिवारवाद का असर

वार्ड-04:

भाजपा ने भूपेंद्र नोतना को टिकट दिया है। इससे पहले इनके परिवार से नीलम पार्षद रह चुकी हैं। निर्दलीय प्रत्याशी रोहताश लाठर भी चुनावी दौड़ में हैं, जिनकी पत्नी कमलेश लाठर 2018 तक पार्षद थीं।

वार्ड-06:

यहां निर्दलीय प्रत्याशी अंकित कुमार हैं। उनके पिता विनोद तितोरिया कांग्रेस से पार्षद रह चुके हैं।

वार्ड-08:

भाजपा ने संकल्प भंडारी को टिकट दिया, जबकि उनकी पत्नी मेघा भंडारी 2018 से पार्षद थीं।

वार्ड-09:

भाजपा ने सुजाता अरोड़ा को टिकट दिया है। इससे पहले उनके देवर मुकेश अरोड़ा 2018 से पार्षद थे, जबकि 2013-2018 तक सुजाता खुद इस पद पर रह चुकी हैं।

वार्ड-10:

भाजपा से टिकट न मिलने के बाद पूर्व पार्षद वीर विक्रम कुमार की बेटी आयशा कुमार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही हैं। वीर विक्रम 2018 तक प्रदेश सरकार के मनोनीत पार्षद भी थे।

वार्ड-11:

भाजपा ने संजीव मेहता को प्रत्याशी बनाया है। उनके पिता शशी पाल मेहता पूर्व में प्रदेश के उद्योग मंत्री रह चुके हैं।

वार्ड-12:

भाजपा ने मोनिक गर्ग को टिकट दिया है। यहां पहले उनकी पत्नी मोनिका गर्ग पार्षद थीं। इससे पहले, 2013-2018 तक उनके पिता कृष्ण गर्ग पार्षद और सीनियर डिप्टी मेयर भी रह चुके हैं।

वार्ड-13:

पूर्व पार्षद ईश गुलाटी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले उनके पिता सुदेश गुलाटी दो बार पार्षद रह चुके हैं।

वार्ड-14:

भाजपा ने अमृत लाल जोशी को प्रत्याशी बनाया है। उनकी पत्नी पहले पार्षद रह चुकी हैं। 2018 तक कांग्रेस से पार्षद रहे विनोद तितोरिया इस बार निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि उनके बेटे ने भी एक अन्य वार्ड से चुनाव में ताल ठोकी है।

वार्ड-15:

पूर्व पार्षद युद्धवीर सैनी की पत्नी प्रियंका देवी निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं। युद्धवीर 2018 से पार्षद थे।

वार्ड-18:

भाजपा के पूर्व पार्षद हरीश कुमार निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। 2013-2018 तक उनकी पत्नी इसी वार्ड से पार्षद थीं।

वार्ड-19:

भाजपा ने पूर्व सीनियर डिप्टी मेयर राजेश अग्घी को मैदान में उतारा है। उनके पिता भगवानदास और पत्नी दोनों पहले पार्षद रह चुके हैं।

वार्ड-20:

कांग्रेस से टिकट कटने के बाद तरुण चौहान निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में हैं। उनके पिता दिवंगत जोगिंद्र चौहान 2013-2018 तक पार्षद रह चुके हैं।

चुनावी समीकरणों पर परिवारवाद का प्रभाव

करनाल के इन 13 वार्डों में परिवारवाद का असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। इस बार के निकाय चुनाव में नए चेहरों की बजाय पुराने सियासी परिवारों का वर्चस्व बना हुआ है। मतदाता इसे परिवारवाद मान रहे हैं या अनुभव का फायदा, यह परिणाम के बाद ही साफ होगा।

भाजपा बनाम कांग्रेस: प्रतिष्ठा की जंग

भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। भाजपा ने 20 में से सभी वार्डों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि कांग्रेस 15 वार्डों में चुनाव लड़ रही है। दोनों दल निर्दलीय प्रत्याशियों को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश में जुटे हैं।

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निष्कर्ष

करनाल नगर निगम चुनाव में परिवारवाद का प्रभाव साफ नजर आ रहा है। एक ही परिवार के सदस्य विभिन्न वार्डों से चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे यह चुनाव पारंपरिक राजनीति बनाम नए चेहरों की परीक्षा का रूप ले चुका है। क्या जनता परिवारवाद को नकारेगी या राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले उम्मीदवारों को समर्थन देगी? यह 26 फरवरी को होने वाले मतदान के बाद ही पता चलेगा।

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