✍🏻 लेखक: संजय शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार (20 वर्षों का अनुभव)
हिसार (हरियाणा)। पर्वतों की बुलंदियों को छूने का सपना हर कोई नहीं देखता, और उनमें भी कुछ ही लोग होते हैं जो अपने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं। हरियाणा के छोटे से गांव मिंगनीखेड़ा के रहने वाले नरेंद्र कुमार ने वो कर दिखाया है जो दुनियाभर के पर्वतारोहियों के लिए एक सपना होता है – नेपाल के खतरनाक माने जाने वाले माउंट अन्नपूर्णा (Mount Annapurna) पर तिरंगा लहराना।
नरेंद्र कुमार: गांव से शुरू हुई यात्रा, जिसने इतिहास रच दिया
हिसार जिले के इस साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले नरेंद्र ने 12 दिन के भीतर 8,091 मीटर ऊंची अन्नपूर्णा चोटी को फतह कर भारत का नाम रोशन किया। यह वही अन्नपूर्णा पर्वत है जिसे पर्वतारोहण की दुनिया में सबसे खतरनाक चोटियों में गिना जाता है। हर वर्ष यहां कई अनुभवी पर्वतारोही अपनी जान गंवा देते हैं। ऐसे में नरेंद्र की यह उपलब्धि न केवल साहसिक है, बल्कि प्रेरणादायक भी है।
मिशन अन्नपूर्णा: 25 मार्च से 7 अप्रैल तक संघर्ष और सफलता
नरेंद्र ने 25 मार्च 2024 को भारत से अन्नपूर्णा अभियान के लिए प्रस्थान किया। इस पूरे अभियान को पूरा करने में कुल 12 दिन लगे, और 7 अप्रैल की सुबह 10:30 बजे उन्होंने अन्नपूर्णा की चोटी पर तिरंगा फहराया। उस पल की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, जिनमें नरेंद्र हिमाच्छादित शिखर पर गर्व से तिरंगा थामे खड़े नजर आते हैं।
खतरों से भरी होती है अन्नपूर्णा की चढ़ाई
अन्नपूर्णा पर्वत पर मौसम का मिज़ाज पल-पल बदलता है। यहां अक्सर बर्फीले तूफान, एवलांच (हिमस्खलन) और ऑक्सीजन की भारी कमी से स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। ऐसे में वहां पहुंचकर तिरंगा फहराना किसी युद्ध जीतने से कम नहीं है। नरेंद्र ने बताया कि उन्हें दिन-रात बर्फबारी और तेज हवाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन अपने संकल्प और देशभक्ति की भावना के बल पर उन्होंने विजय प्राप्त की।
पूर्ववर्ती सफलताएं: यूनम पीक से किलिमंजारो तक का सफर
यह पहली बार नहीं है जब नरेंद्र ने किसी शिखर पर भारत का झंडा फहराया हो। 2021 में उन्होंने हिमाचल प्रदेश की यूनम पीक पर 151 फीट लंबा तिरंगा लगाकर रिकॉर्ड कायम किया था। इसके अलावा वे माउंट किलिमंजारो (Tanzania) और माउंट ल्होत्से (नेपाल) जैसी ऊंची चोटियों पर भी चढ़ाई कर चुके हैं।
नेताओं ने की तारीफ, गांव में हुआ भव्य स्वागत
उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, कैबिनेट मंत्री रणबीर गंगवा, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह और अन्य गणमान्य नेताओं ने उन्हें शुभकामनाएं दीं।
नरेंद्र जब अपने गांव मिंगनीखेड़ा लौटे, तो वहां का नज़ारा किसी त्योहार से कम नहीं था। ढोल-नगाड़ों की धुन पर ग्रामीणों ने उनका स्वागत किया। युवा लड़कों ने बाइक रैली निकाली और पूरे गांव ने गर्व के साथ अपने लाल का अभिनंदन किया।
ग्राम पंचायत ने भी नरेंद्र को विशेष समारोह में सम्मानित किया। यह पल सिर्फ नरेंद्र के लिए नहीं, बल्कि पूरे हरियाणा और भारत के लिए गौरवपूर्ण था।
अगला लक्ष्य: कंचनजंगा और फिर विश्व की 14 सर्वोच्च चोटियां
नरेंद्र का अगला लक्ष्य कंचनजंगा (8,586 मीटर) की चढ़ाई है, जो भारत और नेपाल की सीमा पर स्थित दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। उनका सपना है कि वे दुनिया की सभी 14 ऊंची चोटियों (Eight-thousanders) पर तिरंगा फहराएं और भारत को वैश्विक पर्वतारोहण मानचित्र पर एक नई ऊंचाई दें।
परिवार का संबल और सीमित संसाधनों के बावजूद जुनून
नरेंद्र एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनके पास ना तो कोई बड़ी संस्था की मदद थी और ना ही महंगी सुविधाएं। उन्होंने खुद ही प्रशिक्षण लिया, उपकरण जुटाए और सरकारी/गैर-सरकारी स्तर पर सहायता की गुहार लगाई।
उनके परिवार ने हर कदम पर साथ दिया। उनकी मां कहती हैं, “हमें डर भी लगा था, लेकिन बेटा कहता था कि ‘मां, मैं देश के लिए कुछ बड़ा करना चाहता हूं।’ आज उसकी मेहनत रंग लाई।”
