आज से ठीक 49 साल पहले, 25 जून 1975 को, इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली सरकार ने देश पर इमरजेंसी थोपी थी। इस दौरान लोगों से उनके मौलिक अधिकार तक छीन लिए गए थे। हालांकि यह पहली बार नहीं था जब देश में आपातकाल लगाया गया था, लेकिन जिस वजह से और जिन परिस्थितियों में इसकी घोषणा की गई थी, उससे पूरे देश में उथल-पुथल मच गई थी। 1975 के पहले भी देश में दो बार इमरजेंसी लगाई गई थी, लेकिन दोनों ही बार इसके पीछे ठोस वजह थी। आइए जानते हैं कि 1975 से पहले कब-कब और क्यों इमरजेंसी लगानी पड़ी थी और 1975 की इमरजेंसी पर क्यों बवाल मचता है।
आपातकाल क्या है और इसे कैसे लागू किया जाता है?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर आपातकाल की घोषणा की जाती है। इसके तहत नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं। जब सम्पूर्ण देश या किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण या आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था या अस्थिरता आदि की स्थिति उत्पन्न हो जाए, उस समय उस क्षेत्र की सभी राजनैतिक और प्रशासनिक शक्तियां राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं। भारत में अब तक तीन बार आपातकाल लग चुका है। इसमें वर्ष 1962, 1971 तथा 1975 में अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था।
1962 में पहला आपातकाल
पहली बार देश में आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 के बीच लगा। यह वह दौर था जब भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था। उस समय आपातकाल की घोषणा इसलिए की गई क्योंकि तब “भारत की सुरक्षा” को “बाहरी आक्रमण से खतरा” घोषित किया गया था। उस वक्त देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे। इस आपातकाल के दौरान देश ने कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उचित ठहराया।
1971 में दूसरा आपातकाल
दूसरी बार आपातकाल 3 दिसंबर 1971 से 17 दिसंबर 1971 के बीच लगाया गया। यह वह वक्त था जब भारत-पाकिस्तान युद्ध चल रहा था। इस समय भी देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए आपातकाल की घोषणा की गई थी। 1971 में भी बाहरी आक्रमण का खतरा देखते हुए आपातकाल की घोषणा की गई थी। उस समय वीवी गिरी राष्ट्रपति थे और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। इस युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ और भारत ने बड़ी सैन्य विजय हासिल की, लेकिन आपातकाल का निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा के तहत लिया गया था।
1975 का आपातकाल
तीसरी बार इमरजेंसी की घोषणा इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए 25 जून 1975 को की गई। तब आपातकाल लागू करने के पीछे कारण देश में आंतरिक अस्थिरता को बताया गया। इंदिरा कैबिनेट ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल की घोषणा करने की सिफारिश की। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक लागू रहा। यह सबसे विवादास्पद और राजनीतिक रूप से संवेदनशील आपातकाल था, जिसे आज भी याद किया जाता है और चर्चा में लाया जाता है।
तीसरे आपातकाल पर क्यों मचता है बवाल?
तीसरे आपातकाल को राजनीतिक दल अलोकतांत्रिक फैसला बताते हुए इंदिरा सरकार और कांग्रेस को घेरते रहते हैं। जिन परिस्थितियों में आपातकाल लागू करने की घोषणा की गई थी और जिस तरीके से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसकी जानकारी दी, उसे लेकर सवाल उठे। इंदिरा सरकार के फैसले को तानाशाही बताते हुए विभिन्न संगठन खिलाफ उतर आए और भारी विरोध शुरू हो गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला और इमरजेंसी की घोषणा
दरअसल, 1975 में आपातकाल लागू करने का ऐलान इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद आया था। हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रायबरेली से निर्वाचन को रद्द कर दिया था और अगले 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। इसके बाद इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग शुरू हो गई और देश में जगह-जगह आंदोलन होने लगे। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद आपातकाल की घोषणा की गई थी।
आपातकाल का प्रभाव
आपातकाल के दौरान, नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया, और राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय कहा जाता है। इस दौरान कई राजनीतिक नेताओं को जेल में डाल दिया गया, जिनमें जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई और अन्य प्रमुख नेता शामिल थे। इस समय देश में सेंसरशिप लागू की गई, जिसमें मीडिया पर कड़ी निगरानी रखी गई और किसी भी विरोधाभासी सामग्री को प्रकाशित करने पर रोक लगा दी गई।
आपातकाल के खिलाफ विरोध
आपातकाल के खिलाफ व्यापक विरोध हुआ। विभिन्न राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन इंदिरा गांधी के इस फैसले के खिलाफ उठ खड़े हुए। विरोधियों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन फिर भी देशभर में विरोध जारी रहा। इस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अन्य संगठनों ने भूमिगत तरीके से काम किया और विरोध प्रदर्शन जारी रखा। विरोध का यह सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक 1977 में इमरजेंसी हटाई नहीं गई और चुनाव नहीं हुए।
इमरजेंसी का अंत और जनता पार्टी की जीत
21 मार्च 1977 को आपातकाल हटाया गया और आम चुनावों की घोषणा की गई। इन चुनावों में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी की सरकार बनी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने इमरजेंसी के दौरान हुए अत्याचारों की जांच की और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
निष्कर्ष
भारत में अब तक तीन बार आपातकाल लग चुका है, लेकिन 1975 का आपातकाल सबसे विवादास्पद और चर्चित है। इस आपातकाल ने भारतीय राजनीति पर गहरा असर डाला और देश को यह सोचने पर मजबूर किया कि लोकतंत्र और मौलिक अधिकार कितने महत्वपूर्ण हैं। 1975 का आपातकाल आज भी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद किया जाता है और इससे सीखे गए सबक हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।
आपातकाल के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू
सकारात्मक पहलू
राष्ट्रीय सुरक्षा: आपातकाल ने सरकार को बाहरी और आंतरिक खतरों से निपटने के लिए तत्काल और कठोर कदम उठाने की क्षमता प्रदान की। 1962 और 1971 के आपातकाल इस दृष्टिकोण से लागू किए गए थे।
राजनीतिक स्थिरता: आपातकाल के दौरान सरकार ने त्वरित निर्णय लिए, जिससे तात्कालिक राजनीतिक स्थिरता आई।
नकारात्मक पहलू
मौलिक अधिकारों का निलंबन: आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, जिससे लोगों की स्वतंत्रता पर गहरा आघात पहुंचा।
प्रेस सेंसरशिप: मीडिया पर कड़ी निगरानी और सेंसरशिप लागू की गई, जिससे सूचनाओं का स्वतंत्र प्रवाह बाधित हुआ।
राजनीतिक प्रतिशोध: विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जिससे राजनीतिक प्रतिशोध की भावना प्रबल हुई।
भारत में अब तक तीन बार आपातकाल लग चुका है, लेकिन 1975 का आपातकाल सबसे विवादास्पद और चर्चित है। इस आपातकाल ने भारतीय राजनीति पर गहरा असर डाला और देश को यह सोचने पर मजबूर किया कि लोकतंत्र और मौलिक अधिकार कितने महत्वपूर्ण हैं। 1975 का आपातकाल आज भी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में याद किया जाता है और इससे सीखे गए सबक हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।
