अयोध्या में 93 बच्चों को CWC ने किया रेस्क्यू: मौलवी ने कहा – “मदरसा ले जा रहा हूं, बच्चों को नहीं पता कहां जा रहे थे”

अयोध्या में 93 बच्चों को CWC ने किया रेस्क्यू: मौलवी ने कहा - "मदरसा ले जा रहा हूं, बच्चों को नहीं पता कहां जा रहे थे"
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अयोध्या में एक चाइल्ड वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन ने एक अत्यंत गंभीर प्रकरण में कदम उठाते हुए 93 बच्चों को एक बस से रेस्क्यू किया है। ये बच्चे अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित थे और बिहार के अररिया से यूपी के मदरसों में ले जाए जा रहे थे। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में, बस के अलावा दो दर्जन से अधिक यात्री भी मौजूद थे। कई बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके माता-पिता की अभी तक कोई सूचना नहीं मिली है। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने इस मामले में एक बड़ा स्कैम और जालसाजी का संदेह जताया है। इस मामले में जल्द से जल्द कार्रवाई की जाए, ताकि ऐसी घटनाएं रोकी जा सकें और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। कइयो की उम्र 5 साल से 9 साल के बीच है.

बस में बच्चों को जानवरों की तरह भरा गया था, यह खबर आज सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इन बच्चों का अनुमानित आयु सिर्फ़ 5 से 10 साल है, और उन्हें एक अज्ञात संख्या में एक बस में ढका हुआ पाया गया था। दुखद बात यह है कि इन बच्चों में से कई गरीब परिवारों से हैं, और कुछ के माता-पिता अज्ञात हैं।

चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्यों ने इस मामले को गंभीरता से लिया है, और कहा है कि इन बच्चों के अधिकांश आधार कार्ड फर्जी हो सकते हैं। इस मामले की जाँच जारी है, और यह संभावना है कि इसमें बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है।

चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष ने बताया कि

चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष ने बताया कि उन्हें एक सूचना मिली थी, जिसमें बिहार के अररिया से सहारनपुर ले जाने वाले बच्चों के अवैध लायक़ा जाने की बात सामने आई थी। इस घटना पर तत्काल कार्रवाई करते हुए, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने बच्चों को कस्टडी में ले लिया है। इस मामले की जांच जारी है और उचित कार्रवाई की जाएगी।

कानूनी कार्रवाई के तहत जो लोग पकड़े गए हैं, उनके पास इन बच्चों के अभिभावकों द्वारा किसी भी तरह का सुपुर्दगी पत्र नहीं मिला है। इसमें कई ऐसे बच्चे शामिल हैं, जिनके पास मां-बाप नहीं हैं। वर्तमान में इन बच्चों को फिलहाल शेल्टर होम में रखा जाएगा। इन बच्चों के परिवार के लोगों से संपर्क करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

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बच्चों के माता-पिता आएंगे तो उनको सुपुर्द किया जाएगा, यह एक ऐसा मानवीय मूल्य है जो हमारे समाज में महत्वपूर्ण है। लेकिन फिलहाल, बच्चों के साथ न तो माता-पिता हैं, न ही उनका सुपुर्दगी पत्र ही है। ऐसे बच्चे भी हैं, जो अनाथ हैं, जिनके माता-पिता नहीं हैं. यह बिहार के अररिया से सहारनपुर की तरफ जा रहे थे.

बस में 93 बच्चों के अलावा दो दर्जन से ज्यादा यात्री भी सवार थे

हैरानी की बात यह है कि एक बस में इन 93 बच्चों को बैठाया गया था और साथ ही साथ दो दर्जन से अधिक पैसेंजर भी बैठ गए थे. जानवरों से भी बदतर स्थिति में बच्चों को बिहार से यूपी के देवबंद स्थित मदरसे तक ले जाया जा रहा था। बस में सवार यात्री अनवार ने बताया कि हम लोग अररिया में सवार हुए और मुजफ्फरनगर जा रहे थे। हमने गाड़ी वाले से पूछा कि इसमें तो मदरसे के बच्चे हैं तो उसने कहा तुम्हें बच्चों से क्या मतलब, तुम पैसेंजर हो बैठो। एक अन्य यात्री राहुल सिंह ने कहा कि बच्चों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है, मैं अररिया से लुधियाना जा रहा हूं। वह लोग अलग हैं। हम अलग हैं।

मदरसा संचालक ने बच्चों के बारे में क्या बताया?

बिहार से यूपी के देवबंद के जिन दो मदरसों में इन बच्चों को ले जाया जा रहा था, उनमें से एक मदरसे का रजिस्ट्रेशन भी नहीं है। एक मदरसे के प्रबंधक से हमने बात की। मदरसा संचालक रिजवान ने कहा कि यह बच्चे पहले भी हमारे यहां पढ़ते थे और इस बार भी पढ़ रहे हैं। उनके घरवालों ने कहा था कि आप आ जाएं, एक आदमी यहां से चला जाएगा छोड़ने। जैसे हमारे बच्चे पहले पढ़ रहे थे, वैसे ही आगे पढ़ेंगे। रिजवान ने कहा कि हमारे यहां नर्सरी क्लास से कक्षा 5 तक पढ़ाई होती है। हिंदी, इंग्लिश, उर्दू और दीन की तालीम दी जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ये बच्चे एक दूसरे को पहचान क्यों नहीं रहे हैं?

बच्चे अपने ही स्कूल के मदरसा संचालक को कैसे नहीं पहचान रहे हैं? जिन बच्चों को आपस में भाई बताया जा रहा है, वह एक दूसरे को पहचानने तक से इनकार क्यों कर रहे हैं?

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