अमेरिकी कोर्ट के तलाक़ आदेश को चंडीगढ़ कोर्ट ने किया खारिज
चंडीगढ़ जिला अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अमेरिका की सुपीरियर कोर्ट ऑफ कैलिफोर्निया के पांच साल पुराने तलाक़ के आदेश को अमान्य करार दिया। यह मामला हरियाणा की एक युवती से जुड़ा था, जिसने अपने पति द्वारा अमेरिका में लिए गए तलाक़ को भारत में चुनौती दी थी। इस फैसले को भारतीय विवाह कानून की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
शादी के तीन महीने बाद ही पति ने अमेरिका में ले लिया तलाक़
हरियाणा के यमुनानगर की रहने वाली एक युवती की शादी 28 मई 2019 को एक युवक से हुई थी। शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई और इसे 13 जून 2019 को यमुनानगर के रजिस्ट्रार ऑफ मैरिज कार्यालय में हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत रजिस्टर किया गया। शादी के कुछ समय बाद तक दोनों साथ रहे और हनीमून के लिए केरल भी गए।
लेकिन अमेरिका पहुंचने के बाद युवक ने अपना असली रूप दिखाया। उसने युवती को अकेला छोड़ दिया और 10 जुलाई 2019 को सुपीरियर कोर्ट ऑफ कैलिफोर्निया में तलाक़ की अर्जी डाल दी। युवती ने इसका विरोध किया, लेकिन अमेरिकी अदालत ने उसकी बात नहीं सुनी और तलाक़ को मंजूरी दे दी।
भारतीय कानून के अनुसार मान्य नहीं था अमेरिकी कोर्ट का फैसला
युवती ने चंडीगढ़ जिला अदालत में एडवोकेट जीएस कौशल के जरिए अमेरिकी कोर्ट के फैसले को चुनौती दी।
एडवोकेट कौशल ने अदालत में दलील दी कि:
- भारतीय सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, कोई भी विदेशी कोर्ट का तलाक़ का फैसला तब तक मान्य नहीं होगा, जब तक वह हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के प्रावधानों के तहत नहीं लिया गया हो।
- हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 14 के तहत शादी के एक साल के भीतर तलाक़ की अर्जी दाखिल नहीं की जा सकती।
- अमेरिकी अदालत ने मात्र साढ़े तीन महीने की शादी के बाद तलाक़ की अनुमति दे दी, जो भारतीय कानून के विपरीत है।
- युवक इस मामले में चंडीगढ़ कोर्ट में पेश भी नहीं हुआ।
इन तथ्यों के आधार पर, चंडीगढ़ के सिविल जज कौशल कुमार यादव ने अमेरिकी अदालत के तलाक़ के फैसले को अमान्य करार दिया।
पति ने घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना के मामलों से बचने के लिए लिया तलाक़?
युवती ने अपने पति के खिलाफ चंडीगढ़ विमेन पुलिस स्टेशन में घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करवाई थी। पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर युवक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 और 498A के तहत मामला दर्ज किया।
हालांकि, युवक इस केस में भी अदालत में पेश नहीं हो रहा था। इसके चलते अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
एडवोकेट कौशल ने कहा कि युवक ने इन मामलों से बचने के लिए अमेरिका में तलाक़ लिया था, लेकिन अब यह तलाक़ भारत में मान्य नहीं होगा।
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भारत में विदेशी अदालत के फैसले कब होते हैं मान्य?
भारत में विदेशी अदालतों के तलाक़ से जुड़े फैसलों की मान्यता सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों पर निर्भर करती है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट के अनुसार:
- यदि विदेशी अदालत का फैसला भारतीय विवाह कानूनों के अनुरूप नहीं है, तो उसे भारत में अमान्य माना जाएगा।
- हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत, जब तक दोनों पक्ष किसी विदेशी अदालत में सहमति से तलाक़ की अर्जी नहीं देते, तब तक उस फैसले को भारत में नहीं माना जा सकता।
- यदि किसी एक पक्ष को विदेशी अदालत में न्याय नहीं मिला और उसे अपनी बात रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया, तो वह फैसला भारत में अमान्य हो सकता है।
न्याय की जीत, विदेशी कानूनों पर भारतीय कानून की प्राथमिकता
चंडीगढ़ कोर्ट का यह फैसला न केवल भारतीय विवाह कानूनों की रक्षा करता है, बल्कि यह उन महिलाओं के लिए भी एक मिसाल बन सकता है, जो विदेशों में धोखे का शिकार होती हैं।
इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी विदेशी कोर्ट भारतीय कानूनों की अनदेखी नहीं कर सकती। यदि विवाह भारत में हुआ है, तो तलाक़ की प्रक्रिया भी भारतीय कानूनों के तहत ही होनी चाहिए।
इस तरह, चंडीगढ़ जिला अदालत के इस फैसले ने न्याय और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है।
