अमनप्रीत चौधरी: 400 चैम्पियन बनाने वाली पहली महिला बॉक्सिंग कोच की संघर्ष और सफलता की कहानी

अमनप्रीत चौधरी: 400 चैम्पियन बनाने वाली पहली महिला बॉक्सिंग कोच की संघर्ष और सफलता की कहानी
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पिता का सपना, बेटी ने किया पूरा

हर महिला की सफलता के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी होती है। ऐसी ही कहानी है भारतीय महिला बॉक्सिंग टीम की पहली हेड कोच अमनप्रीत चौधरी की। हिमाचल प्रदेश के छोटे से गाँव सिहारणी (धर्मपुर) से निकलकर उन्होंने 400 से अधिक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को तैयार किया है। लेकिन यह सफर आसान नहीं था। छोटी उम्र में पिता को खोने के बाद, उन्होंने संघर्षों का सामना किया और अपने पिता के सपने को पूरा किया।

अमनप्रीत चौधरी के पिता श्रवण सिंह कबड्डी के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी थे और अपनी बेटी को भी एथलीट बनाना चाहते थे। लेकिन जब अमनप्रीत चौधरी सिर्फ 13 साल की थीं, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया। इस कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने हार नहीं मानी और खेल में अपनी जगह बनाने का फैसला किया।

बास्केटबॉल से बॉक्सिंग तक का सफर

अमनप्रीत चौधरी की खेल यात्रा की शुरुआत बास्केटबॉल से हुई थी। स्कूल पीटीआई हेमचंद ने उनकी लंबाई देखते हुए उन्हें बास्केटबॉल टीम में रखा। उन्होंने इंटर यूनिवर्सिटी स्तर तक इस खेल में अपना स्थान बनाया। लेकिन कॉलेज के दिनों में उनकी रूममेट्स विधुसी और कमलेश ने उन्हें बॉक्सिंग की ओर प्रेरित किया।

उस समय महिला बॉक्सिंग नई थी, लेकिन अमनप्रीत चौधरी ने इसे अपनाने का फैसला किया। उन्होंने चंडीगढ़ के स्केटिंग रिंग में जाकर कोच से संपर्क किया और मुक्केबाजी का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। यही वह मोड़ था, जहां से उनकी जिंदगी ने एक नई दिशा पकड़ ली।

चुनौतियां और मां का हौसला

महिला खिलाड़ियों के लिए खेल की दुनिया आसान नहीं होती। समाज का नजरिया, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और पारिवारिक जिम्मेदारियां – इन सबने अमनप्रीत चौधरी की राह में कई बाधाएँ डालीं। 18 साल की उम्र में जब रिश्तेदारों ने शादी के लिए दबाव बनाया, तब उनकी मां सतिंदर पाल कौर ने उनका समर्थन किया।

ट्रेनिंग के दौरान बहुत लोगों ने उन्हें हतोत्साहित करने की कोशिश की, लेकिन उनकी मां ने उनका मनोबल बनाए रखा। मां खुद के खर्चों में कटौती कर उनकी ट्रेनिंग का खर्च उठाती थीं। उनका यह समर्थन अमनप्रीत के लिए सबसे बड़ा सहारा बना।

कोचिंग करियर की शुरुआत और बड़ी उपलब्धि

23 साल की उम्र में अमनप्रीत चौधरी ने बॉक्सिंग कोचिंग शुरू कर दी। शुरुआत में वह असिस्टेंट महिला कोच के रूप में काम कर रही थीं, लेकिन 2017 में उन्हें भारतीय महिला जूनियर बॉक्सिंग टीम की हेड कोच नियुक्त किया गया। यह एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि इससे पहले किसी महिला को इस पद पर नियुक्त नहीं किया गया था।

उनकी कोचिंग में भारतीय महिला जूनियर बॉक्सिंग टीम ने एशिया में नंबर 1 स्थान हासिल किया। उनके प्रशिक्षण में कई खिलाड़ियों ने ओलंपिक, वर्ल्ड चैंपियनशिप और एशियन गेम्स में पदक जीते।

400 से ज्यादा चैम्पियन तैयार किए

अमनप्रीत चौधरी ने कई मशहूर बॉक्सर्स को ट्रेनिंग दी है, जिनमें शामिल हैं:

  • अरुंधति चौधरी
  • माही राघव
  • विश्व की सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज निकिता चंद
  • अर्जुन अवॉर्डी मैरी कॉम
  • एल. सरिता देवी
  • कविता चहल
  • सोनिया लाठर
  • निखत जरीन
  • स्वीटी बूरा
  • ओलंपियन पूजा रानी

मां बनने के बाद आई सबसे बड़ी चुनौती

2017 में जब अमनप्रीत मां बनीं, तो उनके करियर में एक और कठिन मोड़ आया। फरवरी में माँ बनने के बाद, सितंबर में जब उन्होंने वापसी करनी चाही, तो उन्हें कैंप में जगह नहीं मिली। यह एक बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने शरीर और मानसिक मजबूती पर बहुत काम किया और सितंबर 2017 में उन्हें जूनियर हेड कोच की जिम्मेदारी मिली।

इसके बाद, उन्होंने यूक्रेन टीम के साथ यात्रा की और कई शारीरिक व मानसिक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी जगह वापस बनाई। यह साबित कर दिया कि मेहनत और लगन से किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है।

महिला खिलाड़ियों में आत्मविश्वास बढ़ाया

कोच के रूप में, अमनप्रीत ने सिर्फ तकनीकी कौशल ही नहीं सिखाया, बल्कि खिलाड़ियों के भीतर आत्मविश्वास और संघर्ष की भावना भी विकसित की। उनका मानना है कि “महिलाओं को कभी भी किसी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यदि सपने देखने हैं, तो उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी भी खुद उठानी होगी।”

उन्होंने कई महिला बॉक्सर्स को शादी के बाद भी कमबैक कराया और दिखाया कि इच्छाशक्ति के साथ सब कुछ संभव है।

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महिलाओं के लिए संदेश

महिला दिवस के अवसर पर, अमनप्रीत का महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है:

“महिलाओं का सबसे बड़ा योगदान देश को चलाने में है। खासकर घरेलू महिलाएं, जिनका टाइम मैनेजमेंट किसी भी CEO से बेहतर होता है। वे घर और काम दोनों को संभालती हैं, जो किसी भी कंपनी चलाने से अधिक मुश्किल होता है।”

वह कहती हैं कि “औरतें पानी की तरह होती हैं, उन्हें जिस साँचे में डालो, वे उसमें ढल जाती हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि वे खुद को मजबूत बनाएँ और अपने सपनों की जिम्मेदारी खुद उठाएँ।”

निष्कर्ष

अमनप्रीत चौधरी की कहानी उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो खेल, करियर या जीवन में किसी भी क्षेत्र में संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने न केवल अपने पिता का सपना पूरा किया, बल्कि 400 से अधिक खिलाड़ियों को भी सफल बनाया। उनकी मेहनत, संघर्ष और सफलता की यह यात्रा हर महिला को यह सीख देती है कि “यदि आपमें जुनून और हिम्मत है, तो कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती।”

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