तेहरान। ईरान का जश्न इजरायल युद्ध के बाद जितना चौंकाने वाला है, उतना ही सवालों से भरा हुआ भी। इजरायल और ईरान के बीच हालिया सैन्य संघर्ष में ईरान को भारी जान-माल का नुकसान हुआ। इसके बावजूद तेहरान की सड़कों पर विजय उत्सव मनाया जा रहा है, झंडे लहरा रहे हैं, और नेता ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ की कामयाबी के दावे कर रहे हैं। ये नज़ारा देखकर अतीत का वो दृश्य याद आता है जब पाकिस्तान ने भारत से बुरी तरह हारने के बाद भी ‘यौम-ए-तशक्कुर’ (धन्यवाद दिवस) मनाया था। क्या यह सारा आयोजन जनभावनाओं को दिशा देने की एक कूटनीतिक रणनीति है?
तेहरान की सड़कों पर ‘विजय उत्सव’: एक भ्रम या मनोवैज्ञानिक युद्ध?
तेहरान के इंकलाब चौक पर उमड़ी भारी भीड़ एक अलग ही तस्वीर पेश कर रही है। बुर्का पहनी महिलाएं, पगड़ीधारी पुरुष, हाथों में झंडा लिए युवा और वृद्ध—हर वर्ग के लोग सड़कों पर मौजूद हैं। कहीं अयातुल्लाह खामेनेई की तस्वीरें हैं, तो कहीं ‘मौत बर अमेरिका’ और ‘मौत बर इस्राइल’ जैसे उग्र नारे गूंज रहे हैं। यह दृश्य उस कथित ‘विजय’ का है जिसे ईरान का शासन जनता के सामने एक ऐतिहासिक जीत की तरह पेश कर रहा है।
ईरान का जश्न इस समय देशभर में इजरायल के खिलाफ हालिया संघर्ष के बाद मनाया जा रहा है। शासन इसे ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ की सफलता का उत्सव बता रहा है, जबकि जानकारों की मानें तो यह जश्न वास्तव में एक सुनियोजित मनोवैज्ञानिक रणनीति का हिस्सा है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है – जनता का ध्यान सैन्य नुकसान और आंतरिक असंतोष से हटाकर एक राष्ट्रवादी भावना में समेट देना, ताकि शासन की अजेयता की छवि बनी रहे।
असल में, यह ईरान का जश्न हकीकत से कहीं अधिक भ्रम का उत्सव प्रतीत होता है, जो सूचनाओं के युद्ध (Information Warfare) का अहम हिस्सा बन चुका है। युद्ध में हुए व्यापक नुकसान की सच्चाई को छिपाते हुए इसे जीत का मुखौटा पहनाकर पेश किया जा रहा है।
युद्ध में ईरान का नुकसान: परमाणु महत्वाकांक्षा टूटी
12 दिनों तक चले युद्ध में ईरान को सैन्य और रणनीतिक दोनों स्तरों पर भारी नुकसान हुआ।
- 8 से 10 परमाणु वैज्ञानिक मारे गए
- तीन परमाणु केंद्र (नतांज, फोर्डो और इस्फहान) नष्ट
- IRGC का सैन्य ढांचा बिखरा
- 650 से 1000 के बीच नागरिक और सैनिक हताहत
- एयरस्पेस पर नियंत्रण खो बैठा ईरान
अमेरिकी बी-2 बमवर्षकों ने इन प्रतिष्ठानों पर इतनी सटीकता से हमला किया कि ईरान की वर्षों की महात्वाकांक्षा एक झटके में खत्म हो गई। हालांकि ईरान की मीडिया और शासन इसे ‘जीत’ बताकर प्रचारित कर रही है।
जनता का मनोबल बनाए रखने की रणनीति
ईरान का जश्न के इस कथित ‘विजय उत्सव’ को देखने के बाद साफ है कि यह एक राजनैतिक-सामाजिक प्रचार अभियान है। शासन जानता है कि देश के भीतर बढ़ता असंतोष और महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए किसी ‘मिथकीय जीत’ की जरूरत थी।
जैसे पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत से हार के बावजूद ‘बुनियान-अल-मरसूस’ के नाम से एक ‘विजयी’ जवाबी हमला दिखाया, उसी तरह ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ को प्रचारित किया।
पाकिस्तान की कहानी: भारत से हार के बाद भी जश्न
10 मई को भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम हुआ, और 11 मई को पाकिस्तान ने ‘यौम-ए-तशक्कुर’ मनाया। जबकि हकीकत यह थी कि भारत ने पीओके और पाकिस्तान में नौ बड़े आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था।
- 10-11 एयरबेस बर्बाद
- 160 पाकिस्तानी मारे गए
- सैन्य और कूटनीतिक हार स्पष्ट थी
फिर भी पाक मीडिया ने इसे जीत बताई। 12 मई को संसद में लंबी-लंबी तकरीरें हुईं और सेना को शौर्य का प्रतीक बताया गया।
ईरान का मौजूदा उत्सव भी पाकिस्तान की इसी प्रचार नीति की पुनरावृत्ति प्रतीत होता है।
प्रॉक्सी वॉर और झूठ का प्रचार
ईरान के प्रॉक्सी संगठन हिज़्बुल्लाह (लेबनान) और हौती (यमन) भी इस कथित “जीत” के नायक बनाकर पेश किए जा रहे हैं। इनके हमलों को इजरायल पर ‘क्लीन हिट’ बताया गया, जबकि ज़मीनी हकीकत अलग है।
- हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर भारी बमबारी हुई
- हौती विद्रोहियों को यमन में पीछे हटना पड़ा
- इस्राइल की जवाबी कार्रवाई में प्रॉक्सी संगठनों की स्थिति डगमगाई
फिर भी ईरानी शासन और मीडिया इन कार्रवाइयों को “इस्राइल की हार” और “ईरान की महान विजय” के रूप में प्रचारित कर रही है।
नेतन्याहू और ट्रंप सवालों में क्यों?
जब अमेरिका ने ईरान के नतांज, फोर्डो और इस्फहान में स्थित परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले किए, उसके तुरंत बाद CNN और न्यूयॉर्क टाइम्स ने पेंटागन की एक खुफिया रिपोर्ट जारी की।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:
- ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम नष्ट नहीं हुए
- सेंट्रीफ्यूज सुरक्षित थे
- ईरान ने संवेदनशील सामग्री पहले ही निकाल ली थी
इससे सवाल उठे:
- क्या अमेरिका का हमला सिर्फ प्रतीकात्मक था?
- क्या नेतन्याहू और ट्रंप ने सच्चाई छिपाई?
ट्रंप का बयान: “ये फेक न्यूज़ है, हमने ईरान को ज़ोरदार चोट दी है।”
व्हाइट हाउस की सफाई: “हमले हुए, नुकसान हुआ, लेकिन रिपोर्ट की व्याख्या गलत है।”
बाद में खुद ईरान ने भी माना कि उन्हें “बहुत गंभीर नुकसान” उठाना पड़ा। इससे साफ है कि ट्रंप और नेतन्याहू की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे हैं।
मीडिया की भूमिका और जनता को भ्रमित करने का खेल
राजनैतिक प्रचार के इस युग में युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, सूचनाओं से भी लड़ा जा रहा है।
ईरान, पाकिस्तान और अन्य देशों ने ‘मीडिया नैरेटिव’ को हथियार बना लिया है।
- राष्ट्रीय चैनलों पर विजय गीत
- सरकारी सोशल मीडिया पर तस्वीरों और वीडियो की बाढ़
- प्रॉक्सी संगठनों द्वारा झूठे दावे
यह सब एक ‘इन्फॉर्मेशन वारफेयर’ का हिस्सा है, जिसमें असलियत को ढककर सिर्फ वो दिखाया जाता है जो जनता को शांत और राष्ट्रवादी भावनाओं से भर दे।
निष्कर्ष: क्या यह असली विजय है?
ईरान और पाकिस्तान के ये ‘विजय उत्सव’ असल में एक गहरी चिंता की वजह हैं।
दोनों देशों को युद्ध में भारी नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन इन देशों की सत्ता ने उस नुकसान को जीत में बदलकर पेश किया।
इसका मकसद है –
- जनता का विश्वास बनाए रखना
- अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं से ध्यान हटाना
- शासन की अजेयता की छवि बनाना
ऐसे में सवाल यही उठता है:
क्या ये ‘विजय’ असली है या सिर्फ सत्ता द्वारा परोसी गई एक भ्रामक तस्वीर?
