क्या पुलिस की गश्त कानून-व्यवस्था के लिए है या व्यापारियों पर दबाव बनाने का तरीका? करनाल के सिविल लाइन थाना क्षेत्र से उठे आरोपों ने प्रशासन और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
व्यापारियों की पीड़ा: “व्यापार करना मुश्किल हो गया”
कार एसेसरीज शोरूम संचालकों का कहना है कि थाना प्रभारी रामलाल गश्त के दौरान अक्सर उनकी दुकानों के बाहर खड़ी गाड़ियों को लेकर सीधे दुकानदारों से उलझ जाते हैं। व्यापारियों का आरोप है कि थाना प्रभारी बिना पूरी स्थिति जाने दुकानदारों को ही दोषी ठहराते हैं, जिससे न केवल अपमान की स्थिति बनती है, बल्कि ग्राहकों के सामने उनकी साख भी प्रभावित होती है।
शोरूम मालिक यतिन, मन्नू कश्यप सहित अन्य व्यापारियों ने एसपी को दिए ज्ञापन में बताया कि उनकी दुकानों के बाहर अक्सर बाहर से आने वाले लोग अपनी गाड़ियां खड़ी कर कहीं और चले जाते हैं। जब दुकानदार वाहन हटाने का अनुरोध करते हैं तो कई बार विवाद की स्थिति बन जाती है। व्यापारियों का कहना है कि यह स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर होती है, इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई का सामना उन्हें ही करना पड़ता है।
पुलिस गश्त या दबाव?
व्यापारियों का आरोप है कि थाना प्रभारी गश्त के नाम पर दुकानों के बाहर रुकते हैं और बिना किसी पूर्व चेतावनी के सख्त लहजे में बात करते हैं। उनका कहना है कि कई बार पुलिसकर्मी ग्राहकों के सामने ही दुकानदारों को डांटते-फटकारते हैं, जिससे बाजार में नकारात्मक संदेश जाता है।
व्यापारियों ने यह भी कहा कि पुलिस की इस कार्यप्रणाली से रोजमर्रा का व्यापार प्रभावित हो रहा है। ग्राहक असहज महसूस करते हैं और कई बार बिना खरीदारी किए ही लौट जाते हैं। एक व्यापारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“अगर हर दिन पुलिस से ही डर लगा रहेगा तो हम व्यापार कैसे करेंगे?”
एसपी कार्यालय में शिकायत
मंगलवार को दर्जनों व्यापारी एसपी कार्यालय पहुंचे और पूरे मामले से पुलिस अधीक्षक को अवगत कराया।
व्यापारियों ने मांग की कि थाना प्रभारी को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं कि वह व्यापारियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करें और केवल कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में ही हस्तक्षेप करें।
एसपी ने सभी व्यापारियों की बात ध्यानपूर्वक सुनी और निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया।
एसपी ने कहा कि किसी भी व्यापारी को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाएगा और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो उचित कार्रवाई की जाएगी।
दो पक्ष, दो दावे
इस पूरे मामले में जहां एक ओर व्यापारी वर्ग थाना प्रभारी पर आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर मुगल केनाल एसोसिएशन थाना प्रभारी के समर्थन में सामने आ गई है।
एसोसिएशन का कहना है कि पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह निष्पक्ष है और यह कदम क्षेत्र में अव्यवस्था और अवैध पार्किंग को रोकने के लिए उठाए जा रहे हैं।
एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि दुकानों के बाहर अवैध रूप से खड़ी गाड़ियां न केवल ट्रैफिक जाम का कारण बनती हैं, बल्कि दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ाती हैं।
उनके अनुसार पुलिस यदि सख्ती बरत रही है तो इसे व्यापार में दखल नहीं कहा जाना चाहिए।
थाना प्रभारी का पक्ष
थाना प्रभारी रामलाल ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें निराधार बताया है।
उनका कहना है कि कुछ दुकानदार जानबूझकर माहौल बिगाड़ रहे हैं और अव्यवस्था फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
थाना प्रभारी के अनुसार,
“हमारी जिम्मेदारी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। दुकानों के बाहर गलत तरीके से खड़ी गाड़ियां आम लोगों के लिए परेशानी बनती हैं। यदि दुकानदार सहयोग नहीं करते तो सख्ती करनी पड़ती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस किसी के व्यापार के खिलाफ नहीं है, बल्कि नियमों के तहत व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास कर रही है।
बड़ा सवाल: संतुलन कहां?
यह पूरा मामला एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—
क्या पुलिस और व्यापारियों के बीच संवाद की कमी इस टकराव की असली वजह है?
एक ओर व्यापारी अपने सम्मान और आजीविका की रक्षा की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर पुलिस प्रशासन कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक हित का हवाला दे रहा है।
ऐसे में आवश्यकता है एक संतुलित दृष्टिकोण की, जहां न तो कानून कमजोर पड़े और न ही व्यापारियों को अनावश्यक उत्पीड़न का सामना करना पड़े।
संपादकीय दृष्टिकोण
मेरे 20 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में ऐसे विवाद अक्सर देखने को मिले हैं। अधिकांश मामलों में समस्या की जड़ संवाद की कमी और स्पष्ट दिशानिर्देशों का अभाव होती है। यदि पुलिस प्रशासन व्यापारियों के साथ बैठकर पार्किंग, ट्रैफिक और बाजार व्यवस्था को लेकर स्पष्ट नियम तय करे, तो ऐसे टकराव से बचा जा सकता है।
आगे क्या?
अब निगाहें एसपी की कार्रवाई पर टिकी हैं।
क्या जांच निष्पक्ष होगी?
क्या व्यापारियों को राहत मिलेगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
करनाल के व्यापारी वर्ग और आम जनता दोनों ही इस सवाल का जवाब चाहते हैं।
