मुख्य मार्गों पर खुले नाले: नगर निगम की लापरवाही कब बनेगी जानलेवा हादसे की जिम्मेदार?

मुख्य मार्गों पर खुले नाले: नगर निगम की लापरवाही कब बनेगी जानलेवा हादसे की जिम्मेदार?
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शहर की सड़कों पर दौड़ती ज़िंदगी, लेकिन ज़मीन के नीचे खुला मौत का जाल… सवाल ये नहीं कि हादसा होगा या नहीं, सवाल ये है—अगला शिकार कौन?

मुख्य मार्गों पर खुले नाले शहर की व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। नगर निगम की लापरवाही अब केवल अव्यवस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सीधे तौर पर आमजन की जान के लिए खतरा बन चुकी है। शहर के सबसे व्यस्त, सबसे महत्वपूर्ण और तथाकथित “वीआईपी” मार्गों पर भी नालों का खुला होना इस बात का प्रमाण है कि जिम्मेदार महकमा चेतावनी संकेतों और दुर्घटनाओं के बावजूद बेपरवाह बना हुआ है।

शहर की लाइफलाइन पर खतरे की लाइन

निर्मल कुटिया से गांधी चौक को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग शहर की लाइफलाइन माना जाता है। यही रास्ता बाजारों, स्कूलों, अस्पतालों और प्रशासनिक क्षेत्रों को जोड़ता है। सुबह से लेकर देर रात तक इस मार्ग पर हजारों वाहन, पैदल यात्री, छात्र-छात्राएं, बुजुर्ग और महिलाएं आवाजाही करते हैं।
लेकिन इसी सड़क के दोनों ओर बने नालों पर कई जगह स्लैब गायब हैं। कहीं स्लैब टूटे हुए हैं, तो कहीं आधे-अधूरे रखे गए हैं। दिन में ये खतरे किसी तरह दिख भी जाते हैं, लेकिन रात के अंधेरे में यही खुले नाले मौत का फंदा बन जाते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इन नालों को ढक दिया जाता, तो कई दुर्घटनाओं को रोका जा सकता था। शनिवार शाम नीलोखेड़ी में निर्माणाधीन खुले नाले में गिरकर एक बुजुर्ग की मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया, लेकिन अफसोस कि यह हादसा भी नगर निगम की नींद नहीं खोल सका।

अस्पताल के बाहर भी नहीं सुरक्षित

कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज और सरकारी अस्पताल के बाहर बने नालों की स्थिति और भी चिंताजनक है। अस्पताल ऐसा स्थान होता है, जहां लोग उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन यहां खुले नाले डर और असुरक्षा का माहौल पैदा कर रहे हैं।
यहां रोजाना सैकड़ों मरीज, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और उनके परिजन आते-जाते हैं। कई बार व्हीलचेयर, स्ट्रेचर और मरीजों को सहारा देकर ले जाते लोग इन खुले नालों के बेहद करीब से गुजरते हैं। एक छोटी सी चूक गंभीर हादसे में बदल सकती है।

स्थानीय दुकानदारों और निवासियों का कहना है कि रात के समय कई लोग इन नालों में गिरकर घायल हो चुके हैं। कुछ मामलों में तो अस्पताल लाए गए मरीज खुद अस्पताल के बाहर हादसे का शिकार हो गए। बावजूद इसके, नगर निगम ने न तो स्लैब लगाए और न ही चेतावनी बोर्ड या रिफ्लेक्टर लगाने की जहमत उठाई।

ड्रेन नंबर… जहां डर के साये में चलना मजबूरी

शहर के ड्रेन नंबर और उससे जुड़े मार्गों की हालत किसी से छिपी नहीं है। ड्रेन के स्लैबों के बीच बड़े-बड़े गैप बने हुए हैं। कई जगह ड्रेन की दीवारें टूट चुकी हैं, जिससे सड़क किनारे चलना भी जोखिम भरा हो गया है।
ये ड्रेन शहर की जल निकासी के मुख्य साधन हैं, लेकिन सुरक्षा इंतजामों के अभाव में यही ड्रेन जानलेवा साबित हो रहे हैं।

बरसात के दिनों में स्थिति और भयावह हो जाती है। पानी भरने से नालों की गहराई का अंदाजा नहीं लग पाता। राहगीर, खासकर बच्चे और बुजुर्ग, अनजाने में इनमें गिर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या नगर निगम किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा?

जीटी रोड: तेज रफ्तार और खुला खतरा

जीटी रोड शहर का सबसे व्यस्त मार्ग है। दिन-रात भारी ट्रैफिक, तेज रफ्तार वाहन और बाहर से आने-जाने वाले लोग—सब कुछ यहीं से गुजरता है। लेकिन इसी जीटी रोड के किनारे खुले नाले प्रशासन की कार्यशैली पर करारा तमाचा हैं।
दोपहिया वाहन चालक, पैदल यात्री और साइकिल सवार यहां सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं। कई हादसे हो चुके हैं, लेकिन न तो नालों को ढका गया और न ही कोई संकेतक, रिफ्लेक्टर या बैरिकेड लगाए गए।

चेतावनी संकेतकों का अभाव: सबसे बड़ी लापरवाही

किसी भी निर्माण या खुले ड्रेन के पास चेतावनी संकेतक लगाना प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारी होती है। लेकिन शहर में अधिकांश जगहों पर न तो रेडियम बोर्ड हैं, न बैरिकेड और न ही रात में चमकने वाले रिफ्लेक्टर।
यह लापरवाही सीधे तौर पर हादसों को न्योता दे रही है। सवाल उठता है कि क्या नगर निगम किसी जान की कीमत पर ही जागेगा?

जिम्मेदार कौन?

नगर निगम, ठेकेदार, अभियंता और निरीक्षण व्यवस्था—सभी की जिम्मेदारी तय होती है। लेकिन हर हादसे के बाद जांच की बात कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई बार शिकायतें दी गईं, फोटो और वीडियो भेजे गए, लेकिन नतीजा सिफर रहा। जब जनता खुद अपनी सुरक्षा के लिए आवाज उठा रही है, तो जिम्मेदार महकमा क्यों मौन है?

कानून और जवाबदेही का सवाल

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कई बार सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर सख्त निर्देश दे चुके हैं। खुले नाले, अधूरे निर्माण और लापरवाह कार्यशैली सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन हैं।
यदि किसी हादसे में जान जाती है, तो क्या नगर निगम और संबंधित अधिकारियों पर आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज होगा? यह सवाल अब शहर के हर नागरिक की जुबान पर है।

अब भी नहीं चेते तो देर हो जाएगी

शहर के नागरिकों की मांग है कि

  • सभी खुले नालों को तत्काल ढका जाए
  • टूटे स्लैब बदले जाएं
  • रात के लिए रिफ्लेक्टर और चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं
  • जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो

यह केवल सुविधा का नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का सवाल है।

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