सिलेंडर की अनियमित आपूर्ति से बदली रसोई की तस्वीर, करनाल में कई घरों में फिर जलने लगे मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी की आंच।
करनाल में गैस सिलेंडर की अनियमित आपूर्ति से बदल रही रसोई की व्यवस्था
करनाल। करनाल गैस सिलेंडर संकट के कारण शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू रसोई की व्यवस्था प्रभावित होती दिखाई दे रही है। समय पर गैस सिलिंडर उपलब्ध न होने और बुकिंग के बाद लंबा इंतजार करने की स्थिति ने घरों की महिलाओं की चिंता बढ़ा दी है। कई घरों में अब सिलेंडर बचाने के लिए रसोई का तरीका बदल गया है। कहीं इंडक्शन चूल्हे का सहारा लिया जा रहा है तो कहीं मिट्टी के चूल्हे दोबारा जलने लगे हैं।
एक समय ऐसा था जब एलपीजी गैस सिलेंडर खत्म होने पर तुरंत नया सिलिंडर मिल जाता था और घरों की रसोई बिना किसी बाधा के चलती रहती थी। लेकिन पिछले कुछ समय से सिलिंडर की आपूर्ति में देरी और बुकिंग की अनिश्चितता ने लोगों को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में महिलाएं लकड़ी जलाकर मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाने लगी हैं, जबकि शहरों में कई घरों में गैस की बचत के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जा रहे हैं।
घरेलू रसोई पूरी तरह महिलाओं के जिम्मे होती है, ऐसे में सिलेंडर की अनियमित उपलब्धता का सीधा असर उनकी दिनचर्या पर पड़ रहा है। कई महिलाएं अब दिन में एक बार मिट्टी के चूल्हे पर सब्जी बनाकर रख लेती हैं और रोटियां गैस पर बनाती हैं ताकि सिलिंडर अधिक समय तक चल सके।
गैस बचाने के लिए बदल रहा खाना बनाने का तरीका
करनाल में कई घरों में रसोई का पूरा सिस्टम बदलता नजर आ रहा है। महिलाएं अब गैस के उपयोग को सीमित करने के लिए नई रणनीति अपना रही हैं। सुबह और दोपहर का खाना एक साथ तैयार किया जा रहा है, जबकि शाम के समय मिट्टी के चूल्हे या इंडक्शन का सहारा लिया जा रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह बदलाव ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। गांवों में पहले भी मिट्टी के चूल्हों का उपयोग किया जाता था, लेकिन एलपीजी के बढ़ते उपयोग के बाद यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई थी। अब गैस सिलेंडर की कमी के कारण वही पुराने चूल्हे फिर से जलने लगे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि गैस सिलेंडर की अनियमित आपूर्ति लंबे समय तक जारी रही तो रसोई में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग और बढ़ सकता है।
एक समय गैस, एक समय मिट्टी के चूल्हे पर खाना
शहर की निवासी राजमनी बताती हैं कि सिलेंडर खत्म होने का डर हर समय बना रहता है। पहले जब गैस खत्म होती थी तो तुरंत नया सिलिंडर मिल जाता था, लेकिन अब बुकिंग के बाद भी कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है।
उनका कहना है कि इस स्थिति को देखते हुए उन्होंने रसोई का तरीका बदल दिया है। अब वह दिन में एक समय गैस पर खाना बनाती हैं और शाम के समय मिट्टी के चूल्हे का उपयोग करती हैं।
राजमनी के अनुसार, “अगर गैस खत्म हो जाए और तुरंत नया सिलिंडर न मिले तो पूरा घर परेशान हो जाता है। इसलिए हमने पहले से ही चूल्हा तैयार कर लिया है ताकि जरूरत पड़ने पर खाना बनाया जा सके।”
जरूरत पड़ने पर इंडक्शन का सहारा
करनाल की निवासी कुसुम बताती हैं कि उन्होंने भविष्य की परेशानी को देखते हुए पहले से ही एक अतिरिक्त सिलिंडर भरवा कर रख लिया है, लेकिन फिर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
उनका कहना है कि अब गैस का उपयोग कम करने के लिए इंडक्शन चूल्हे का सहारा लिया जा रहा है।
कुसुम कहती हैं,
“हम कोशिश करते हैं कि खाना जल्दी तैयार हो जाए और गैस कम खर्च हो। जब ज्यादा जरूरत होती है तो इंडक्शन पर खाना बना लेते हैं। इससे सिलिंडर ज्यादा समय तक चल जाता है।”
हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि कई बार बिजली कटौती होने से इंडक्शन का उपयोग भी संभव नहीं हो पाता।
बुकिंग में परेशानी, चूल्हे का सहारा
सुनीता देवी बताती हैं कि उनके घर में हर महीने दो गैस सिलेंडर तक इस्तेमाल हो जाते हैं। लेकिन इस समय एक सिलेंडर की बुकिंग कराने में भी काफी परेशानी आ रही है।
उन्होंने बताया कि पहले सिलिंडर खत्म होने से पहले ही बुकिंग करा दी जाती थी और समय पर सिलिंडर मिल जाता था। लेकिन अब कई बार बुकिंग के बाद भी इंतजार करना पड़ता है।
सुनीता देवी के अनुसार,
“घर में गैस है, लेकिन हम उसे कम इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर अचानक सिलिंडर खत्म हो जाए और नया सिलिंडर न मिले तो बड़ी परेशानी हो जाएगी। इसलिए हमने फिर से मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाना शुरू कर दिया है।”
विकल्प के तौर पर बनाया मिट्टी का चूल्हा
रीना का कहना है कि गैस सिलिंडर की अनिश्चितता ने रसोई का पूरा सिस्टम बदल दिया है। अब गैस को बचाकर इस्तेमाल किया जा रहा है और कई बार इंडक्शन का सहारा लिया जाता है।
लेकिन बिजली कटौती भी एक बड़ी समस्या बन जाती है। ऐसे में उन्होंने दो दिन पहले ही घर के आंगन में मिट्टी का चूल्हा बना लिया है।
रीना बताती हैं,
“अगर बिजली चली जाए और गैस भी खत्म हो जाए तो खाना बनाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए हमने विकल्प के तौर पर चूल्हा तैयार कर लिया है।”
शहर से गांव तक असर
गैस सिलिंडर की अनियमित आपूर्ति का असर केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। शहरों में भी कई घरों में गैस बचाने के लिए नए तरीके अपनाए जा रहे हैं।
कुछ घरों में सुबह और दोपहर का खाना एक साथ तैयार किया जा रहा है। कई परिवारों ने इंडक्शन चूल्हा खरीद लिया है, जबकि कुछ लोग अभी भी मिट्टी के चूल्हे का सहारा ले रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
घरेलू बजट पर भी असर
गैस सिलेंडर की अनियमित आपूर्ति का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू बजट पर भी पड़ रहा है।
कई परिवारों को इंडक्शन चूल्हा खरीदना पड़ा है। वहीं लकड़ी और अन्य ईंधन की व्यवस्था करने में भी खर्च बढ़ रहा है।
इसके अलावा खाना बनाने में ज्यादा समय लगने से महिलाओं की दिनचर्या भी प्रभावित हो रही है।
प्रशासन और गैस एजेंसियों से उम्मीद
लोगों का कहना है कि यदि गैस एजेंसियां समय पर सिलिंडर उपलब्ध कराएं तो यह समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है।
कई उपभोक्ताओं ने यह भी कहा कि गैस बुकिंग और डिलीवरी की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि लोगों को समय पर जानकारी मिल सके।
