सही समय पर बजट नहीं: बाल संरक्षण संस्थाएं सरकार के दरवाजे पर

सही समय पर बजट नहीं: बाल संरक्षण संस्थाएं सरकार के दरवाजे पर
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जिन हाथों में बच्चों का भविष्य है, उन्हीं हाथों में आज अनिश्चितता… सवाल यह नहीं कि समस्या है, सवाल यह है कि समाधान कब?

सही समय पर नहीं मिल रहा बजट, बाल संरक्षण संस्थाएं जाएंगी सरकार के पास

करनाल।
सही समय पर बजट न मिलने और प्रशासनिक अनुमतियों में हो रही देरी ने प्रदेश की बाल संरक्षण संस्थाओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। बच्चों के संरक्षण, पुनर्वास और भविष्य निर्माण का दायित्व संभाल रही ये संस्थाएं अब सरकार से सीधे संवाद की तैयारी में हैं। इसी कड़ी में बुधवार को करनाल स्थित एमडीडी बाल भवन में कन्फेडरेशन ऑफ नान गवर्नमेंट चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें हरियाणा के कई जिलों से आए पदाधिकारियों ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं।

बैठक का मुख्य स्वर एक ही था—नीतियां तो हैं, लेकिन समय पर संसाधन नहीं हैं। कहीं सरकारी बजट अटका हुआ है, तो कहीं संस्थाओं को संचालन की अनुमति नहीं मिल पा रही। इस असंतुलन का सीधा असर उन बच्चों पर पड़ रहा है, जिनके लिए ये संस्थाएं आखिरी सहारा हैं।

अलग-अलग जिलों की एक जैसी पीड़ा

बैठक में अंबाला, रोहतक, कुरुक्षेत्र, करनाल और सोनीपत जैसे जिलों में संचालित बाल संरक्षण केंद्रों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सभी ने अपने-अपने अनुभव साझा किए, लेकिन समस्याओं की जड़ लगभग एक जैसी निकली—वित्तीय अनिश्चितता और प्रशासनिक जटिलताएं।

बैठक की अध्यक्षता जिला बाल कल्याण समिति के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मान ने की। उन्होंने कहा कि बाल संरक्षण केंद्र केवल संस्थाएं नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी हैं। यदि इन्हें समय पर सहयोग नहीं मिला, तो इसका खामियाजा समाज को लंबे समय तक भुगतना पड़ेगा।

18 वर्ष के बाद दिव्यांग बच्चों का क्या?

जन शिक्षण संस्थान, रोहतक से आए पदाधिकारी आरपी सैनी ने एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि उनके सामने सबसे बड़ी समस्या 18 वर्ष से अधिक आयु के दिव्यांग और मंदबुद्धि बच्चों के संरक्षण को लेकर है।

उन्होंने कहा,

“18 साल पूरे होते ही ये बच्चे कानूनी रूप से बाल श्रेणी से बाहर हो जाते हैं, लेकिन उनकी जरूरतें खत्म नहीं होतीं। नीतियों में इस वर्ग के लिए स्पष्ट व्यवस्था का अभाव है।”

यह सवाल केवल एक संस्था का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का है—क्या 18 साल के बाद ये बच्चे व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं रहते?

2024-25 की ग्रांट अब तक लंबित

कुरुक्षेत्र के लाडवा से पहुंचे शीशपाल मढ़ान ने बताया कि 2024-25 की सरकारी ग्रांट अब तक कई चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन (CCI) को नहीं मिली है।

उन्होंने कहा कि बजट में देरी का असर सीधा बच्चों की दैनिक जरूरतों पर पड़ता है—भोजन, शिक्षा, चिकित्सा और काउंसलिंग जैसी बुनियादी सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।

“संस्थाएं दान और कर्ज के सहारे कब तक चलेंगी?” – यह सवाल उन्होंने प्रशासन से किया।

दो साल से अटकी दत्तक ग्रहण एजेंसी की अनुमति

एमडीडी बाल भवन, करनाल के संस्थापक पी.आर. नाथ ने बताया कि उनकी संस्था पिछले दो वर्षों से विशेषीकृत दत्तक ग्रहण एजेंसी चलाने की अनुमति के लिए प्रयासरत है, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं हो पाया।

उन्होंने कहा कि इससे न केवल संस्थान का विकास रुका है, बल्कि कई ऐसे बच्चे भी परिवार पाने से वंचित रह गए हैं, जिन्हें गोद लिया जा सकता था।

लिखित में सरकार तक पहुंचेगी आवाज

बैठक के अंत में सुरेंद्र सिंह मान ने स्पष्ट किया कि सभी समस्याओं को लिखित रूप में संकलित कर सरकार के समक्ष रखा जाएगा। इसके साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि यदि जरूरत पड़ी तो सामूहिक प्रतिनिधिमंडल बनाकर संबंधित विभागों से मुलाकात की जाएगी।

उन्होंने कहा,

“यह आंदोलन नहीं, संवाद है। हम टकराव नहीं चाहते, समाधान चाहते हैं।”

क्यों जरूरी है समय पर बजट?

बाल संरक्षण संस्थाएं केवल इमारतें नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे बच्चों का घर हैं जिन्हें परिवार का सहारा नहीं मिला। समय पर बजट न मिलने से:

  • बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है
  • पोषण और स्वास्थ्य सेवाएं बाधित होती हैं
  • प्रशिक्षित स्टाफ संस्थाएं छोड़ने को मजबूर होता है
  • पुनर्वास और काउंसलिंग कार्यक्रम ठप पड़ जाते हैं

यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो इसके सामाजिक परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई

सरकारी योजनाओं और जमीनी सच्चाई के बीच की दूरी इस बैठक में साफ दिखाई दी। कागजों पर सब कुछ व्यवस्थित है, लेकिन फाइलों की धीमी रफ्तार ने बच्चों के भविष्य को अधर में डाल दिया है।

बाल संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर बजट और स्पष्ट प्रशासनिक दिशा-निर्देश मिल जाएं तो संस्थाएं कहीं बेहतर परिणाम दे सकती हैं।

आगे क्या?

अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर हैं। क्या इन संस्थाओं की आवाज सुनी जाएगी? क्या 2024-25 की ग्रांट जल्द जारी होगी? क्या दत्तक ग्रहण एजेंसियों को लंबित अनुमतियां मिलेंगी?

इन सवालों के जवाब आने वाले समय में तय करेंगे कि बाल संरक्षण व्यवस्था कितनी संवेदनशील और प्रभावी है।

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