करनाल नगर निगम में बड़ा खुलासा: बिना सबूत विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी, 61 मामलों से हड़कंप

करनाल नगर निगम में बड़ा खुलासा: बिना सबूत विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी, 61 मामलों से हड़कंप
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15 दिन में टूटी शादी, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में आज भी वैध! सवालों के घेरे में नगर निगम का पोर्टल सिस्टम

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बिना सबूत और गवाह नगर निगम ने जारी किए 61 विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र

करनाल नगर निगम में नियमों की अनदेखी, प्रशासनिक लापरवाही या सिस्टम की आड़ में बड़ा खेल?

करनाल।
करनाल नगर निगम इन दिनों एक गंभीर प्रशासनिक और कानूनी सवालों के घेरे में है। बिना सबूत और गवाह विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी किए जाने का मामला सामने आने के बाद नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। हैरानी की बात यह है कि यह कोई एक-दो मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि बीते छह महीनों में ऐसे करीब 61 विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके हैं, जिनमें न तो दस्तावेजों का सत्यापन हुआ और न ही गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित की गई।

यह पूरा मामला उस समय उजागर हुआ, जब सोमवार को एक शिकायतकर्ता नगर निगम कार्यालय में मेयर से मिलने पहुंचा और उसने अपने बेटे के विवाह पंजीकरण को लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई। शिकायतकर्ता की बात सुनकर स्वयं मेयर भी हैरान रह गईं।

15 दिन में शादी, फिर तलाक… लेकिन प्रमाणपत्र जारी

सेक्टर-32 निवासी शिकायतकर्ता ने बताया कि उनके बेटे सचिन की शादी लाइनपार क्षेत्र की एक युवती से हुई थी। शादी के बाद दोनों पक्षों में आपसी सहमति से मात्र 15 दिन के भीतर पंचायती तलाक हो गया। तलाक की प्रक्रिया कोर्ट के माध्यम से नहीं, बल्कि आपसी सामाजिक सहमति से पूरी की गई थी।

शिकायतकर्ता ने बताया कि शादी के दौरान उन्होंने केवल सीएससी (कॉमन सर्विस सेंटर) से विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन किया था, लेकिन इसके बाद न तो नगर निगम की ओर से कोई जांच की गई, न ही दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन हुआ। इसके बावजूद कुछ ही समय बाद उनके पास विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी होने की सूचना आ गई।

यहीं से पूरा मामला संदिग्ध हो गया।

सवालों के घेरे में निगम की प्रक्रिया

शिकायतकर्ता का सबसे बड़ा सवाल यह है कि—

  • जब शादी टूट चुकी थी
  • जब कोई गवाह मौजूद नहीं था
  • जब कोई दस्तावेज जमा नहीं कराए गए
  • जब कोई अधिकारी सत्यापन के लिए मौके पर नहीं आया

तो फिर विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र आखिर किस आधार पर जारी किया गया?

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब नगर निगम खुद यह कह रहा है कि वह इस प्रमाणपत्र को रद्द नहीं कर सकता, क्योंकि विवाह पंजीकरण को केवल कोर्ट के आदेश से ही निरस्त किया जा सकता है।

मेयर के सामने आया मामला, अधिकारियों ने झाड़ा पल्ला

शिकायत मिलने के बाद मेयर रेणु बाला गुप्ता ने तुरंत संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया। लेकिन अधिकारियों का जवाब और भी चौंकाने वाला रहा। अधिकारियों ने दावा किया कि—

“ये सभी विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र पोर्टल से ऑटोमेटिक जारी हो गए हैं। इसमें किसी कर्मचारी की कोई भूमिका नहीं है।”

जब मेयर ने पूछा कि ऐसे कितने प्रमाणपत्र जारी हुए हैं, तो अधिकारियों ने स्वीकार किया कि—

“पिछले छह महीनों में करीब 61 प्रमाणपत्र इस तरह जारी हो चुके हैं।”

इस जवाब ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी, बल्कि डिजिटल सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए।

आयुक्त के अवकाश काल में हुआ खेल?

सूत्रों के अनुसार, यह पूरा सिलसिला उस दौरान शुरू हुआ, जब नगर निगम आयुक्त अवकाश पर थीं। इसी अवधि में बिना दस्तावेज और बिना गवाहों के विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र लगातार जारी होते रहे।

यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है कि—

  • क्या आयुक्त की गैरमौजूदगी में निगरानी तंत्र कमजोर हो गया?
  • क्या कर्मचारियों ने सिस्टम की खामियों का फायदा उठाया?
  • या फिर जानबूझकर नियमों को दरकिनार किया गया?

“ऑटोमेटिक पोर्टल” की दलील कितनी सही?

अधिकारियों की ओर से दी गई “ऑटोमेटिक पोर्टल” की दलील कई सवाल खड़े करती है। अगर पोर्टल खुद ही बिना दस्तावेजों के प्रमाणपत्र जारी कर रहा है, तो—

  • दस्तावेज अपलोड करने की शर्त क्यों है?
  • गवाहों के आधार कार्ड की मांग क्यों की जाती है?
  • पंडित, मैरिज पैलेस और फोटो एल्बम की प्रक्रिया क्यों बनाई गई?

विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी सरकारी पोर्टल बिना मानवीय सत्यापन के अंतिम प्रमाणपत्र जारी नहीं करता। ऐसे में यह तर्क प्रशासनिक जवाबदेही से बचने की कोशिश माना जा रहा है।

कोर्ट से ही रद्द होगा प्रमाणपत्र, पीड़ित की बढ़ी परेशानी

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस विवाह का अस्तित्व ही अब नहीं है, उसका प्रमाणपत्र सरकारी रिकॉर्ड में आज भी वैध बना हुआ है।

नगर निगम का कहना है कि—

“विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र केवल कोर्ट के आदेश से ही रद्द किया जा सकता है।”

इसका मतलब यह हुआ कि पीड़ित परिवार को अब कोर्ट जाना पड़ेगा, वकील करना पड़ेगा, समय और पैसा खर्च करना पड़ेगा- जबकि गलती उनकी नहीं, बल्कि सिस्टम और प्रशासन की है।

क्या है विवाह पंजीकरण की वैधानिक प्रक्रिया?

नगर निगम द्वारा विवाह प्रमाणपत्र जारी करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। इनमें निम्न दस्तावेज अनिवार्य होते हैं-

आवश्यक दस्तावेजों की सूची

  1. लड़का और लड़की दोनों का आधार कार्ड
  2. दोनों की 10वीं की डीएमसी या जन्म प्रमाणपत्र
  3. दोनों की फैमिली आईडी / परिवार पहचान पत्र
  4. दोनों पक्षों से माता-पिता का आधार कार्ड
  5. दो गवाह – एक लड़के की ओर से, एक लड़की की ओर से
    • केवल खून के रिश्तेदार मान्य
  6. शादी कराने वाले पंडित का लेटर पैड
  7. शादी स्थल (पैलेस/धर्मशाला) का लेटर पैड
  8. दोनों पक्षों के शादी कार्ड
  9. शादी की छह बड़ी फोटो
    • माता-पिता के पैर छूते हुए
    • मांग भरते हुए
    • वरमाला
    • फेरे
  10. कपल की 6 राशन कार्ड साइज फोटो
  11. पासपोर्ट साइज फोटो
  12. सभी उपस्थित व्यक्तियों के हस्ताक्षर

इन सभी दस्तावेजों के बिना प्रमाणपत्र जारी होना नियमों का सीधा उल्लंघन है।

प्रशासनिक लापरवाही या सुनियोजित अनियमितता?

अब बड़ा सवाल यह है कि—

  • क्या यह सिर्फ तकनीकी चूक है?
  • या फिर कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय है?
  • क्या भविष्य में ऐसे प्रमाणपत्र किसी कानूनी विवाद, संपत्ति विवाद या फर्जी दावों का आधार बनेंगे?

कानूनी जानकारों का मानना है कि फर्जी या अपूर्ण विवाह पंजीकरण भविष्य में—

  • महिला अधिकारों
  • भरण-पोषण
  • संपत्ति बंटवारे
  • उत्तराधिकार
    जैसे मामलों में गंभीर विवाद पैदा कर सकता है।

मेयर का आश्वासन, लेकिन कार्रवाई कब?

मेयर रेणु बाला गुप्ता ने सभी 61 विवाह प्रमाणपत्रों की जांच कराने और रिपोर्ट सौंपने का आश्वासन दिया है। साथ ही शिकायतकर्ता को भरोसा दिलाया गया है कि—

“दोषियों पर कार्रवाई होगी और व्यवस्था को दुरुस्त किया जाएगा।”

हालांकि, अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि—

  • जिम्मेदार अधिकारी कौन होंगे
  • पोर्टल में सुधार कब होगा
  • पीड़ितों को राहत कैसे मिलेगी

जनता का सवाल: भरोसा किस पर करें?

आज जब सरकार “डिजिटल इंडिया” और “ई-गवर्नेंस” की बात करती है, तब इस तरह की घटनाएं आम नागरिक के भरोसे को तोड़ती हैं।

अगर बिना शादी, बिना गवाह और बिना दस्तावेज विवाह पंजीकरण हो सकता है, तो—

  • कानून का महत्व क्या रह जाता है?
  • सरकारी प्रमाणपत्रों की विश्वसनीयता कहां जाती है?

निष्कर्ष

करनाल नगर निगम का यह मामला केवल 61 प्रमाणपत्रों का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख का सवाल है। अगर समय रहते पारदर्शी जांच और सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह लापरवाही भविष्य में बड़े कानूनी और सामाजिक संकट को जन्म दे सकती है।

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