कोको द्वीप विवाद: क्या भारत ने म्यांमार को तोहफे में दिया, जानिए क्यों है यह बेहद महत्वपूर्ण?

कोको द्वीप विवाद: क्या भारत ने म्यांमार को तोहफे में दिया, जानिए क्यों है यह बेहद महत्वपूर्ण?
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कुछ समय पहले, भारतीय राजनीति में कच्चातिवु द्वीप के विवाद की बातें तेजी से बढ़ी हैं। इस द्वीप को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस को घेरते हुए यह दावा किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे श्रीलंका को दे दिया था. ये बहस थमी भी नहीं कि नया विवाद उठ खड़ा हुआ कि कोको द्वीपसमूह को भारत ने म्यांमार को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय में दे दिया था. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए अंडमान-निकोबार समूह से प्रत्याशी विष्णु पद रे ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कोको द्वीप को भारत से अलग कर म्यांमार को सौंपा था.

इस द्वीप की स्थिति अब चीन के कंट्रोल में है। एक न्यूज एजेंसी से हुई बातचीत के दौरान, रे ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने बीते 70 सालों में कभी इसे ध्यान में नहीं रखा. आज, केंद्र सरकार की ओर से कैंपबेल खाड़ी में चीन के साथ मुकाबले के लिए एक नया शिपयार्ड और दो डिफेंस हवाई अड्डे की नींव रखी जा रही है। इस नई पहल के माध्यम से भारत अपनी सामरिक और रक्षात्मक क्षमता को मजबूत करने का निर्णय ले रहा है.

नेहरू ने यह किया था? एक नजर में जानिए कहानी!

यह एक विवादकारी मुद्दा है जिसपर अलग-अलग तरीके से विचार हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के ब्रिटिश शासन के दौरान इस पर अंग्रेजी राज्यव्यवस्था थी। ये द्वीप समूह ब्रिटिश इंडिया के प्रांत के रूप में आते थे. अंडमान-निकोबार के आजाद होने के साथ-साथ, यहां के राज्य भारत के मुक्त राष्ट्र का हिस्सा बन गए हैं। इसी समय, कोको द्वीप समूह को ब्रिटिश शासकों ने म्यांमार (जो उस समय बर्मा था) को सौंप दिया था। बर्मा के अदालती अधिकारों की एक सीरियस चर्चा के बाद, इस क्षेत्र के संपत्ति का मामला फिर से उठ चुका है.

एक दूसरा दावा भी है

इस अनुसार, 19वीं सदी में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्रामियों को सजा देने के लिए अंडमान द्वीप का चयन किया था. इस जगह पर बंदीग्रहितों और अन्य कर्मचारियों के लिए खाने की आपूर्ति कोको आइलैंड से आती थी. कथित रूप से, ब्रिटिश अधिकारी ने इस द्वीप को बर्मा के एक प्रभावशाली परिवार को लीज पर सौंप दिया है, ताकि अनाज और सब्जियों के उगाने के झंझट से बचा जा सके. बर्मा भी वह स्थान था जो पूर्व में ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था.

तीसरी थ्योरी में साजिश की बात

ब्रिटिश सरकार ने इसे भारत से अलग करने का फैसला जानबूझकर किया ताकि वह भारतीय समर्थन से वंचित रहे और सामरिक दृष्टिकोण से अपनी स्थिति को मजबूत न बना सके. द ट्रिब्यून में एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें ब्रिटिश सरकार के इस कदम का उल्लेख किया गया था, जो ब्रिटिश आर्मी के जॉइंट प्लानिंग स्टाफ द्वारा पहले ही कोको द्वीप पर अपना कब्जा जमा लेने का प्रस्ताव किया गया था.

कैसा है कोको द्वीप

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाहर कोको द्वीप, जिसकी दूरी लगभग 55 किलोमीटर है, विवाद की चर्चा में है। इस छोटे से द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 20 वर्ग किलोमीटर है, लेकिन इसके पीछे एक रहस्यमय कहानी भी छिपी है. समुद्र के किनारे बसे कई जगहों में नारियल की खेती का प्राचुर्य होता है, लेकिन कोको आइलैंड पर यही नारियल का उत्पादन अत्यधिक है। इसी कारण से इसे ‘कोको आइलैंड’ के नाम से जाना जाता है। यह द्वीप दो भागों में विभाजित है ग्रेट कोको और स्मॉल कोको आइलैंड.

एक दृश्य, जहाँ ध्यान किसी और दिशा में है और एक साधारण द्वीप समूह अपने हाल के हाल में बगुलों की तरह अधिकांश लोगों के नजरों से उजागर नहीं हो रहा है। म्यांमार द्वीपसमूह का हिस्सा बनने के बाद, वहां के सैन्य कमांडर जनरल ने इसे पीनल कॉलोनी बनाने का प्रस्ताव रखा. यहां पहले कैदियों और विद्रोहियों को रखा जाता था, लेकिन 70 के दशक में यहां पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिला.ये वो वक्त था, जब चीनियों ने इस द्वीप में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी.

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आइलैंड्स आमतौर पर समुद्र में छोटे-से टुकड़े होते हैं, लेकिन इनके कई लाभ होते हैं और इसी कारण इन्हें लेने के लिए लोग रस्साकशी करते हैं. कोको द्वीप के साथ भी यही मामला है. चीन ने म्यांमार से एक राहत बैंक के रूप में यह क्षेत्र लिया है और वहाँ सैन्य बेस स्थापित किया गया है। इस बेस पर जेटी, नेवल सेवा और इलेक्ट्रॉनिक गठबंधन की विस्तारित शक्ति है.

म्यांमार ने क्यों दी चीन को छूट? जानें उसके पीछे की कहानी

यह देश राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से विचलित है, जिसमें रोहिंग्या मुस्लिम समेत अनेक विवादित मुद्दे शामिल हैं। इसके साथ ही, वहां की स्थानीय बौद्ध आबादी ने रोहिंग्या मुस्लिमों को स्वीकार नहीं किया है. ये दोनों के बीच तनाव बना रहता है, जो वहां की राजनीति पर भी असर डालता है. नतीजा ये हुआ कि म्यांमार कभी भी आर्थिक संकटों का सामना करते हुए इकनॉमिक तौर पर मजबूत नहीं हो सका.

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ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, म्यांमार को चीन द्वारा भारी कर्ज दिया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 से पहले ही म्यांमार का 40% कर्ज चीन से था. ऐसी स्थिति में म्यांमार सरकार लगभग मजबूर है कि वो चीन को अपने यहां आने दे.

इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव

म्यांमार ने कहा कि वह ने कोको आइलैंड पर चीन को लीज दी है, लेकिन गूगल अर्थ पर दिखी चीनी सेना की तस्वीरें उठाती हैं कि कैसे वह वहां उपस्थित है.चीन की सेना ने कैसे कोको आइलैंड पर बदलाव किया है, जानें। पहले इस द्वीप पर 1000 मीटर की एयरस्ट्रिप थी, जिससे केवल छोटे एयरक्राफ्ट उड़ान भर सकते थे. लेकिन अब यह एयरस्ट्रिप 2500 मीटर हो चुकी है. इसपर मिलिट्री प्लेन्स ही आती-जाती हैं.

सैटेलाइट छवियों से पता चलता है कि रनवे को पांच साल पहले ही विस्तारित किया गया है. ये वह समय था जब चीन ने अपनी आक्रामकता की दिखाई तब मच गई थी बड़ी हलचल। इस बीच भारत के साथ सीमा विवाद भी हुआ था.

जाते हुए कच्चातिवु द्वीप के बारे में जानते चलें

कुछ दिनों पहले, भारत और श्रीलंका के बीच स्थित कच्चातिवु द्वीप को लेकर राजनीतिक घमासान उत्पन्न हुआ। इसमें बीजेपी ने कांग्रेस को निशाने पर लिया है. दरअसल एक RTI के जवाब में बताया गया कि साल 1974 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने श्रीलंका की राष्ट्रपति श्रीमावो भंडारनायके के साथ एक समझौता किया था. इसी के तहत द्वीप को श्रीलंका को सौंप दिया गया. जिस पर विवाद है.

इसके बाद से कई मामलों पर बात हो रही है, जिसमें भारत ने कथित तौर पर अपने हिस्से दूसरे देशों को सौंपे। असल में सत्तर के दशक में भारत और बांग्लादेश का लैंड स्वॉप समझौता इस संदर्भ में अधिक उल्लेखनीय है। इस मामले में, बांग्लादेश को भारतीय राज्य त्रिपुरा से कुछ क्षेत्र दिया गया, जबकि भारत ने उसे बांग्लादेश से कुछ अन्य क्षेत्रों के लिए बदला। यह समझौता दोनों देशों के बीच सीमा संबंधों के पहले महत्वपूर्ण कदमों में से एक था.

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